उपद्रवी स्थान को शुद्ध करने के लिए करें दुर्गा सप्तशती का यह सिद्ध उपाय

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ओम नमः शिवाय,

सज्जनों

बहुत से व्यक्तियों के कुछ इस प्रकार से प्रश्न होते हैं। कि हमारा चलता चलता काम अचानक से रुक गया है और पड़ोस की दुकान वालों का काम अच्छा चलना शुरू हो गया है, डरावने सपने आते हैं, बिना कारण से भय लगता है, कई बार घर में किसी छाया अथवा आकृति का आभास होता है, प्रतिदिन घर में कलह क्लेश होता है, रोजी-रोटी बंद हो गई है, कमाई में बरकत नहीं हो रही है, घर परिवार में कोई खुशियां नहीं है और ना ही कोई खुशी के मौके जीवन में आते हैं, अच्छी डिग्री व योग्यता होने के बावजूद जीवन में सफलता नहीं मिल रही हैं। कई सारे उपाय करने के बावजूद भी कुछ लाभ नहीं मिल रहा है आदि – आदि …….

सज्जनों कई बार कुछ ईर्ष्या व द्वेष से ग्रसित व्यक्ति किसी तांत्रिक अथवा अशुभ शक्तियों का संचालन करने वाले व्यक्तियों के पास जाकर जिससे वह ईर्ष्या – द्वेष और नफरत करते हैं। उसके काम धंधे को बंधवा देते हैं या उनके घर परिवार में तंत्र प्रयोग के द्वारा अशुभ शक्तियां भेजकर पारिवारिक सुख – समृद्धि, स्वास्थ्य आदि को खराब कर देते हैं। यदि किसी व्यक्ति के संग इसी प्रकार की गतिविधि हो रखी है और उस व्यक्ति को लगता है कि अवश्य ही मेरे यहां इस प्रकार की परेशानियां चल रही हैं तो आज हमारे द्वारा श्री दुर्गा सप्तशती (Durga Saptashati) के 12 वें अध्याय के 19 में मंत्र की सिद्धि के बारे में बताया जाएगा। इस मंत्र के प्रयोग से मां भगवती जगदंबा की कृपा से किसी भी प्रकार की तंत्र क्रिया, बंधन क्रिया व अशुभ शक्तियों का समूल विनाश होता है। इस मंत्र का विधिवत अनुष्ठान करने से रोजी-रोटी व किसी भी प्रकार का बंधन खुलता है। ऊपरी अथवा अंदरूनी हवाओं, भूत – प्रेत, ब्लैक मैजिक व अशुभ तंत्र बाधा का समूल नाश होता है।

मंत्र – ॐ ह्रीं दुर्वत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम

रक्षो भूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम् ह्रीं ॐ।।

इस मंत्र का एक दिन में 11000 जाप करके सिद्ध कर लें अथवा नवरात्रि या गुप्त नवरात्रि में प्रतिदिन जाप करके मंत्र को सिद्ध कर लें। तत्पश्चात इस मंत्र का दशांश हवन, हवन का दशांश मार्जन व मार्जन का दशांश तर्पण करें। इसके बाद 8 खेजड़ी (शमी) की लकड़ी, 8 खैर की लकड़ी, 8 लोहे की कील, 8 पीली कौड़ी, 8 हल्दी की गांठ, 8 डोडे वाली लौंग लेकर ऊपर बताए मंत्र से अभिमंत्रित करके उपद्रवी स्थान की 8 दिशाओं में गाड़ दें।

ध्यान रहे की यह पूरी प्रक्रिया मंत्र बोलते हुए अग्नि कोण से दक्षिण दिशा की तरफ से शुरू करनी है तथा एक हाथ का गड्ढा खोदकर दबानी चाहिए। कौड़ी चित्त (कट वाला हिस्सा ऊपर) करके रखनी चाहिए। इस विधिपूर्वक भगवती के मंत्र का प्रयोग करने से वह स्थान सभी प्रकार की बाधाओं से रहित होकर श्रेष्ठ फलदाई हो जाता है। भगवती की कृपा बनाए रखने के लिए प्रत्येक नवरात्रि में सप्तशती का पाठ अथवा सप्तशती के मंत्रों से अपने घर पर यज्ञ करें।

नोट  यह प्रयोग अनेक बार करके अनुभूत किया गया है।

क्या शत्रु ने किया है – मारण, वशीकरण, उच्चाटन प्रयोग ? दुर्गा सप्तशती से करें निवारण (संस्कृत)

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ओम नमः शिवाय

सज्जनों

शास्त्रों में छह प्रकार के आभिचारिक कर्म बताए गए हैं। मतलब अशुभ कार्य जिनके द्वारा दूसरों को दुख, पीड़ा, परेशानी दी जा सकती है। यह 6 प्रकार के आभिचारिक कर्म क्रमशः मारण, मोहन, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन आदि कहलाए जाते हैं।

मारण प्रयोग में व्यक्ति के ऊपर मारक मंत्रों के द्वारा प्रयोग किए जाते हैं। जिससे कि उस पर मृत्यु समान कष्ट आता है अथवा कई बार उसकी मृत्यु भी हो जाती है।

मोहन कर्म में उसको मोह लिया जाता है तथा वशीकरण प्रयोग करके उसको अपने वश में कर लिया जाता है।

स्तंभन प्रयोग में कोई भी चलता हुआ कार्य, चलती हुई गाड़ी अथवा पढ़ाई में अच्छे चल रहे बालक पर यदि स्तंभन प्रयोग कर दिया जाए तो सब चीजें स्तंभित हो जाती हैं अर्थात रुक जाती हैं। कई बार किसी की कोख पर भी स्तंभन कर दिया जाता है। इसलिए उस स्त्री को बालक नहीं हो पाते और कई बार चलती हुई दुकान अथवा काम धंधा भी बिल्कुल ठप हो जाता है। इसका मुख्य कारण स्तंभन प्रयोग ही होता है।

विद्वेषण प्रयोग में जिन व्यक्तियों के बीच आपस में प्यार – प्रेम, स्नेह होता है। उनके ऊपर विद्वेषण प्रयोग कर दिया जाता है। जिस कारण से उनमें आपस में बैर, दुश्मनी, ईर्ष्या, लड़ाई झगड़े होने आरंभ हो जाते हैं।

उच्चाटन प्रयोग में जिस व्यक्ति के ऊपर उच्चाटन प्रयोग होता है। उस व्यक्ति का मन, बुद्धि, अंतरात्मा उच्चाट हो जाती है अर्थात वह पागलों की नाईं इधर-उधर भटकता है। उसका चित्त कहीं भी टिकता नहीं है। इस प्रकार से यह छह आभिचारिक कर्म है और यह प्रयोग जिस किसी व्यक्ति के ऊपर होते हैं तो ऊपर बताए गए विधान के अनुसार उस पर प्रभाव आता है।

शास्त्रों में सातवा कर्म भी बताया गया है। जिसे शांति कहा जाता है। अर्थात इन बताए गए छह आभिचारिक कर्मों की शांति हो जाती है। मेरे द्वारा आज के इस वीडियो में बताया जा रहा है कि जिस किसी व्यक्ति के ऊपर यदि उसके शत्रु ने यह 6 प्रकार के अभिचार कर्म कर दिए हैं तो वह दुर्गा जी की आराधना करके इन सभी की शांति कर सकता है।

आइए जानते हैं इस वीडियो में –

दुर्गा जी की पूजा, अर्चना, व उनकी प्रसन्नता से संबंधित अन्य वीडियोज हमारे द्वारा बनाए गए हैं। उन वीडियोज़ का लिंक हमारे द्वारा नीचे दिया जा रहा है।

नवरात्रि में दुर्गा पाठ करने की सबसे सरल विधि |

दुर्गा श्राप विमोचन कैसे

गायत्री श्राप विमोचन कैसे करें ?

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Maa Durga Mantra| Shtru Vinashak Mantra| दुर्गाद्वात्रिंशन्नाममाला

Durga maa 32 naam

Maa Durga Mantra for Navratri. Know What is Shatru Vinashak Mantra. Learn Happy Navratri special maa durga mantra !

ओम नमः शिवाय ,

सज्जनों वैसे तो मां भगवती (Durga Maa) सदैव ही भक्तों की रक्षा करके उन्हें अभयदान देती हैं। परंतु मेरे द्वारा बताए जा रहे आज का यह स्तोत्र विशेष तौर पर शत्रुओं के विनाश के लिए है। यदि कोई व्यक्ति किसी गहरे संकट में पड़ गया हो, शत्रु के द्वारा घेर लिया गया हो अथवा हिंसक पशु व्याघ्र आदि से ग्रसित हो गया हो तो यदि वह भगवती दुर्गा की स्तुति इस स्तोत्र के द्वारा करे तो अवश्य ही मां भगवती जगदंबा उसकी रक्षा करेंगी। यह स्तोत्र मेरे द्वारा कई बार अनुभूत है। अतः आप सभी साधक व सज्जन भी स्तोत्र का पाठ करके अनुभूति प्राप्त कर सकते हैं।

आइए जानते हैं इस स्तोत्र के बारे में – दुर्गा जी (Maa Durga Ji) की पूजा, अर्चना, व उनकी प्रसन्नता से संबंधित अन्य वीडियोज हमारे द्वारा बनाए गए हैं। उन वीडियोज़ का लिंक हमारे द्वारा नीचे दिया जा रहा है।

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होली पर्व विशेष, होलिका दहन पूजा विधि तथा शुभ मुहूर्त | Holi Muhurat

Holi shubh muhurat

होलिका पर्व विशेष

होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई है इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है होलिका और प्रह्लाद की है। विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार प्रह्लाद के पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने तपस्या कर देवताओं से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वह न तो पृथ्वी पर मरेगा न आकाश में, न दिन में मरेगा न रात में, न घर में मरेगा न बाहर, न अस्त्र से मरेगा न शस्त्र से, न मानव से मारेगा न पशु से। इस वरदान को प्राप्त करने के बाद वह स्वयं को अमर समझ कर नास्तिक और निरंकुश हो गया। उसने अपनी प्रजा को यह आदेश दिया कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की वंदना न करे। अहंकार में आकर उसने जनता पर जुल्म करने आरम्भ कर दिए… यहाँ तक कि उसने लोगो को परमात्मा की जगह अपना नाम जपने का हुकम दे दिया। कुछ समय बाद हिरण्यकश्यप के घर में एक बेटे का जन्म हुआ. उसका नाम प्रह्लाद रखा गया प्रह्लाद कुछ बड़ा हुआ तो, उसको पाठशाला में पढने के लिए भेजा गया पाठशाला के गुरु ने प्रह्लाद को हिरण्यकश्यप का नाम जपने की शिक्षा दी पर प्रह्लाद हिरण्यकश्यप के स्थान पर भगवान विष्णु का नाम जपता था वह भगवान विष्णु को हिरण्यकश्यप से बड़ा समझता था। गुरु ने प्रह्लाद की हिरण्यकश्यप से शिकायत कर दी हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को बुला कर पूछा कि वह उसका नाम जपने के जगह पर विष्णु का नाम क्यों जपता है प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “ईश्वर सर्व शक्तिमान है, उसने ही सारी सृष्टि को रचा है.” अपने पुत्र का उत्तर सुनकर हिरण्यकश्यप को गुस्सा आ गया उसको खतरा पैदा हो गया कि कही बाकि जनता भी प्रह्लाद की बात ना मानने लगे उसने आदेश दिया कहा, “मैं ही सबसे अधिक शक्तिशाली हूं, मुझे कोई नहीं मर सकता मैं तुझे अब खत्म कर सकता हूँ” उसकी आवाज सुनकर प्रह्लाद की माता भी वहां आ गई उसने हिरण्यकश्यप का विनती करते हुए कहा, “आप इसको ना मारो, मैं इसे समझाने का यतन करती हूं” वे प्रह्लाद को अपने पास बिठाकर कहने लगी, “तेरे पिता जी इस धरती पर सबसे शक्तिशाली है उनको अमर रहने का वर मिला हुआ है इनकी बात मान ले ”प्रहलद बोला, “माता जी मैं मानता हूं कि मेरे पिता जी बहुत ताकतवर है पर सबसे अधिक बलवान भगवान विष्णु हैं जिसने हम सभी को बनाया है पिता जो को भी उसने ही बनाया है प्रह्लाद का ये उत्तर सुन कर उसकी मां बेबस हो गयी प्रहलद अपने विश्वास पर आडिग था ये देख हिरण्यकश्यप को और गुस्सा आ गया उसने अपने सिपाहियों को हुकम दिया कि वो प्रह्लाद को सागर में डूबा कर मार दें सिपाही प्रह्लाद को सागर में फेंकने के लिए ले गये और पहाड़ से सागर में फैंक दिया लेकिन भगवान के चमत्कार से सागर की एक लहर ने प्रह्लाद को किनारे पर फैंक दिया सिपाहियों ने प्रह्लाद को फिर सागर में फेंका… प्रह्लाद फिर बहार आ गया सिपाहियों ने आकर हिरण्यकश्यप को बताया फिर हिरण्यकश्यप बोला उसको किसी ऊंचे पर्वत से नीचे फेंक कर मार दो सिपाहियों ने प्रह्लाद को जैसे ही पर्वत से फेंका प्रह्लाद एक घने वृक्ष पर गिरा जिस कारण उसको कोई चोट नहीं लगी हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को एक पागल हाथी के आगे फैंका तो जो हाथी उसको अपने पैरों के नीचे कुचल दे पर हाथी ने प्रह्लाद को कुछ नहीं कहा लगता था जैसे सारी कुदरत प्रह्लाद की मदद कर रही हो। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था होलिका अपने भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी दूर करना चाहती थी होलिका को वरदान था कि उसको आग जला नहीं सकती उसने अपने भाई को कहा कि वो प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठ जाएगी वरदान के कारण वो खुद आग में जलने से बच जाएगी पर प्रह्लाद जल जायेगा लेकिन हुआ इसका उलट और आग में होलिका जल गयी पर प्रह्लाद बच गया होलिका ने जब वरदान में मिली शक्ति का दुरूपयोग किया, तो वो वरदान उसके लिए श्राप बन गया रंगों वाली होली (धुलंडी) के एक दिन पूर्व होलिका दहन होता है। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है, परंतु यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका का दहन बिहार की धरती पर हुआ था। जनश्रुति के मुताबिक तभी से प्रतिवर्ष होलिका दहन की परंपरा की शुरुआत हुई। मान्यता है कि बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के सिकलीगढ़ में ही वह जगह है, जहां होलिका भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर दहकती आग के बीच बैठी थी।इसी दौरान भगवान नरसिंह का अवतार हुआ था, जिन्होंने हिरण्यकश्यप का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सिकलीगढ़ में हिरण्यकश्य का किला था।यहीं भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए एक खंभे से भगवान नरसिंह अवतार लिए थे। भगवान नरसिंह के अवतार से जुड़ा खंभा (माणिक्य स्तंभ) आज भी यहां मौजूद है। कहा जाता है कि इसे कई बार तोड़ने का प्रयास किया गया। यह स्तंभ झुक तो गया, पर टूटा नहीं। अन्य कथा के अनुसार वैदिक काल में इस होली के पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता था। पुराणों के अनुसार ऐसी भी मान्यता है कि जब भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से होली का प्रचलन हु‌आ। होलिका दहन की रात्रि को तंत्र साधना की दृष्टि से हमारे शास्त्रों में महत्वपूर्ण माना गया है | और यह रात्रि तंत्र साधना व लक्ष्मी प्राप्ति के साथ खुद पर किये गए तंत्र मंत्र के प्रतिरक्षण हेतु सबसे उपयुक्त मानी गई है| तंत्र शास्त्र के अनुसार होली के दिन कुछ खास उपाय करने से मनचाहा काम हो जाता है। तंत्र क्रियाओं की प्रमुख चार रात्रियों में से एक रात ये भी है। मान्यता है कि होलिका दहन के समय उसकी उठती हुई लौ से कई संकेत मिलते हैं। होलिका की अग्नि की लौ का पूर्व दिशा ओर उठना कल्याणकारी होता है, दक्षिण की ओर पशु पीड़ा, पश्चिम की ओर सामान्य और उत्तर की ओर लौ उठने से बारिश होने की संभावना रहती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में दहन किया जाता है। होलिका दहन में आहुतियाँ देना बहुत ही जरुरी माना गया है, होलिका में कच्चे आम, नारियल, भुट्टे या सप्तधान्य, चीनी के बने खिलौने, नई फसल का कुछ भाग गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर. आदि की आहुति दी जाती है है|

सावधानी

होलिका दहन की रात्रि तंत्र साधना की रात्रि होने के कारण इस रात्रि आपको कुछ सावधानियां रखनी चाहियें सफेद खाद्य पदार्थो के सेवन से बचें । होलिका दहन वाले दिन टोने-टोटके के लिए सफेद खाद्य पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इसलिए इस दिन सफेद खाद्य पदार्थों के सेवन से बचना चाहिये। सिर को ढक कर रखें । उतार और टोटके का प्रयोग सिर पर जल्दी होता है, इसलिए सिर को टोपी आदि से ढके रहें। कपड़ों का विशेष ध्यान रखें । टोने-टोटके में व्यक्ति के कपड़ों का प्रयोग किया जाता है, इसलिए अपने कपड़ों का ध्यान रखें। विशेष । होली पर पूरे दिन अपनी जेब में काले कपड़े में बांधकर काले तिल रखें। रात को जलती होली में उन्हें डाल दें। यदि पहले से ही कोई टोटका होगा तो वह भी खत्म हो जाएगा।

होलिका दहन पूजा विधि

हिन्दु धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार, होलिका दहन, जिसे होलिका दीपक और छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है, को सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष के समय, जब पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो, करना चाहिये। होली से ठीक एक माह पूर्व अर्थात् माघ पूर्णिमा को ‘एरंड’ या ‘गूलर’ वृक्ष की टहनी को गाँव के बाहर किसी स्थान पर गाड़ दिया जाता है, और उस पर लकड़ियाँ, सूखे उपले, खर-पतवार आदि चारों से एकत्र किया जाता है। पूजन करते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा में हो। सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका में सही मुहर्त पर अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी जाती है। अग्नि प्रज्ज्वलित होते ही डंडे को बाहर निकाल लिया जाता है। यह डंडा भक्त प्रहलाद का प्रतीक है। इसके पश्चात नरसिंह भगवान का स्मरण करते हुए उन्हें रोली , मौली , अक्षत , पुष्प अर्पित करें। इसी प्रकार भक्त प्रह्लाद को स्मरण करते हुए उन्हें रोली , मौली , अक्षत , पुष्प अर्पित करें। होलिका धहन से पहले होलिका के चारो तरफ तीन या सात परिक्रमा करे और साथ में कच्चे सूत को लपेटे। होलिका पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। “अहकूटा भयत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै: अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम:” इस मंत्र का उच्चारण एक माला, तीन माला या फिर पांच माला विषम संख्या के रुप में करना चाहिए। इसके पश्चात् हाथ में असद, फूल, सुपारी, पैसा लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल तथा गूलरी की माला पहनाएं। विधि पंचोपचार की हो तो सबसे अच्छी है। पूजा में सप्तधान्य की पूजा की जाती है जो की गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर। होलिका के समय गेंहू एवं चने की नयी फसले आने लग जाती है अत: इन्हे भी पूजन में विशेष स्थान दिया जाता है। होलिका की लपटों से इसे सेक कर घर के सदस्य खाते है और धन धन और समृधि की विनती की जाती है।

होलिका दहन का शास्त्रोक्त नियम

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए –

    1.   पहला, उस दिन “भद्रा” न हो। भद्रा का ही एक दूसरा नाम विष्टि करण भी है, जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।

    2.   दूसरा, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।

होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।

होलिका दहन शुभ मुहूर्त

होलिका दहन सोमवार, मार्च 9, 2020 को

होलिका दहन मुहूर्त – 06:26 पी एम से 08:52 पी एम : अवधि – 02 घण्टे 26 मिनट्स

भद्रा पूँछ – 09:37 ए एम से 10:38 ए एम

भद्रा मुख – 10:38 ए एम से 12:19 पी एम

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – मार्च 09, 2020 को 03:03 ए एम बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त – मार्च 09, 2020 को 11:17 पी एम बजे

रंगवाली होली (धुलंडी) – 10 मार्च 2020

धनतेरस खीरदारी व पूजन का समय | Dhanteras Puja Muhurat 2019

खरीदारी और पूजन का समय

सज्जनों वैसे तो शास्त्रों के अनुसार धनत्रयोदशी उदय व्यापिनी अर्थात जिस दिन सूर्योदय के समय त्रयोदशी होती है, उस दिन मानी जाती है। परंतु इस साल 25 अक्टूबर 2019 को त्रयोदशी तिथि (dhanteras) का आरंभ  शाम 7:08 बजे हो रहा है; जो अगले दिन 26 अक्टूबर शनिवार को दोपहर 3:47 पर समाप्त होगा। 25 अक्टूबर 2019 को प्रदोष काल शाम 5:42 से रात 8:15 तक रहेगा। शाम 6 बजकर 50 मिनट से रात 8 बजकर 45 मिनट तक वृषभ लग्न रहेगा। अच्छे समय में खरीदारी उत्तम मानी गई है। धनतेरस (dhanteras) की पूजा के लिए 25 अक्टूबर 2019 को सबसे उत्तम समय शाम 7:08 से 8:15 तक है। क्योंकि इस दौरान स्थिर लग्न वृष होगा। प्रदोष काल और त्रयोदशी तिथि (dhanteras) भी रहेगी। धनतेरस (dhanteras) पर सोना, चांदी और स्थायी संपत्ति की खरीदारी के लिए भी यह समय सबसे उत्तम है।

विशेष : – शास्त्रों के अनुसार जो लोग उदय व्यापिनी धनत्रयोदशी में पूजा करना चाहते हैं। वह 26 अक्टूबर 2019 को भी सूर्योदय के बाद भगवान धन्वंतरी जी की पूजा तथा खरीदारी आदि कर सकते हैं।

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धनतेरस के बारे में यह Article आपको पसंद आया हो, तो इसे like और दूसरों को share करें, ताकि यह जानकारी और लोगों तक भी पहुंच सके। आप Comment box में Comment जरुर करें। इस subject से जुड़े प्रश्न आप नीचे Comment section में पूछ सकते हैं।

Kuber Dhanlaxmi Pooja shubh Muhurat – Diwali 2019

Kuber dhanlakshmi puja muhurat

ओम नमः शिवाय,
सज्जनों,
आज के इस एपिसोड में हम जानेंगे की सन 2019 में दीपावली कब की है तथा इस दीपावली में श्री महालक्ष्मी (Maha Laxmi ji) जी व दीपावली (Diwali | Deepawali) पूजन का शुभ मुहूर्त किस समय है ? यंत्र मंत्र तंत्र की सिद्धि के लिए कौन-कौन से मुहूर्त श्रेष्ठ माने गए हैं ? आइए जानते हैं आज के इस एपिसोड में।


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श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत पर्व शंका समाधान | Janmashtami Vrat Parv

Shri Krishna Janmashtmi 2019

कृष्ण जन्मोत्सव (Krishan Janmashtami) पर्व इस वर्ष 23 एवं 24 अगस्त 2019 को मनाया जाएगा। जन्माष्टमी (Janmashtami) जिसके आगमन से पहले ही उसकी तैयारियां जोर शोर से आरंभ हो जाती है पूरे भारत वर्ष में जन्माष्टमी पर्व पूर्ण आस्था एवं श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

श्री कृष्णजन्माष्टमी (Janmashtami) भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्स्व है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के मौके पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (Janmashtami) के पावन मौके पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु इस दिन मथुरा पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जात है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। ज्न्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती है और भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है। और रासलीला का आयोजन होता है।

पौराणिक मान्यता
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पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने पृथ्वी को पापियों से मुक्त करने हेतु कृष्ण रुप में अवतार लिया, भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी और वासुदेव के पुत्ररूप में हुआ था। जन्माष्टमी को स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय के लोग अपने अनुसार अलग-अलग ढंग से मनाते हैं. श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहिणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं तथा वैष्णव मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी एवं उदयकाल रोहिणी नक्षत्र को जन्माष्टमी का त्यौहार मनाते हैं।

अष्टमी दो प्रकार की है- पहली जन्माष्टमी और दूसरी जयंती। इसमें केवल पहली अष्टमी है।

स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्य पुराण का वचन है- श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ‘जयंती’ नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए। विष्णुरहस्यादि वचन से- कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नामवाली ही कही जाएगी। वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए। मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है। भृगु ने कहा है- जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अन्त में पारणा करें। इसमें केवल रोहिणी उपवास भी सिद्ध है। अन्त्य की दोनों में परा ही लें।

श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी की रात्रि को मोहरात्रि कहा गया है। इस रात में योगेश्वर श्रीकृष्ण का ध्यान, नाम अथवा मंत्र जपते हुए जगने से संसार की मोह-माया से आसक्ति हटती है। जन्माष्टमी का व्रत व्रतराज है। इसके सविधि पालन से आज आप अनेक व्रतों से प्राप्त होने वाली महान पुण्यराशिप्राप्त कर लेंगे।

व्रजमण्डलमें श्रीकृष्णाष्टमी (Janmashtami) के दूसरे दिन भाद्रपद-कृष्ण-नवमी में नंद-महोत्सव अर्थात् दधिकांदौ श्रीकृष्ण के जन्म लेने के उपलक्षमें बडे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। भगवान के श्रीविग्रहपर हल्दी, दही, घी, तेल, गुलाबजल, मक्खन, केसर, कपूर आदि चढाकर ब्रजवासीउसका परस्पर लेपन और छिडकाव करते हैं। वाद्ययंत्रोंसे मंगलध्वनि बजाई जाती है। भक्तजन मिठाई बांटते हैं। जगद्गुरु श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नि:संदेह सम्पूर्ण विश्व के लिए आनंद-मंगल का संदेश देता है।

संदिग्ध व्रत पर्व निर्णय
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गत वर्षो की भाँति इस वर्ष भी दो दिन अष्टमी व्याप्त होने से जन्माष्टमी व्रत एंव उत्सव के सम्बन्ध मे संशय बना हुआ है ओर इसी कारण हमारे पुराणो व धर्मग्रंथो मे कृष्ण जन्माष्टमी व्रत व उत्सव का निर्णय स्मार्त मत (गृहस्थ और सन्यासी) व वैष्णव मत (मथुरा वृन्दावन) साम्प्रदाय के लिए अलग अलग सिद्धांतो से किया है। गृहस्थ व उतरी भारत के लोग कृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूजा अर्धरात्रि व्यापिनी अष्टमी रोहिणी नक्षत्र वृषभ लग्न मे करते है जबकि वैष्णव मत वाले लोग विशेष कर मथुरा वृन्दावन अन्य प्रदेशो मे उदयकालिन अष्टमी (नवमी युता) के दिन ही कृष्ण उत्सव मनाते आ रहे है। अर्द्धरात्रि को अष्टमी व रोहिणी नक्षत्र हो या न हो इस बात को महत्व नही देते है। जन्म स्थली मथुरा को आधार मानकर मनाई जाने वाले श्रीकृष्ण उत्सव के दिन ही सरकार छुट्टी की घोषणा करती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत तथा जन्मोत्सव दो अलग अलग स्थितिया है।

जन्माष्टमी निर्धारण के नियम
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1 अष्टमी पहले ही दिन आधी रात को विद्यमान हो तो जन्माष्टमी व्रत पहले दिन किया जाता है।

2 अष्टमी केवल दूसरे ही दिन आधी रात को व्याप्त हो तो जन्माष्टमी व्रत दूसरे दिन किया जाता है।

3 अष्टमी दोनों दिन आधी रात को व्याप्त हो और अर्धरात्रि (आधी रात) में रोहिणी नक्षत्र का योग एक ही दिन हो तो जन्माष्टमी व्रत रोहिणी नक्षत्र से युक्त दिन में किया जाता है।

4 अष्टमी दोनों दिन आधी रात को विद्यमान हो और दोनों ही दिन अर्धरात्रि (आधी रात) में रोहिणी नक्षत्र व्याप्त रहे तो जन्माष्टमी व्रत दूसरे दिन किया जाता है।

5 अष्टमी दोनों दिन आधी रात को व्याप्त हो और अर्धरात्रि (आधी रात) में दोनों दिन रोहिणी नक्षत्र का योग न हो तो जन्माष्टमी व्रत दूसरे दिन किया जाता है।

6 अगर दोनों दिन अष्टमी आधी रात को व्याप्त न करे तो प्रत्येक स्थिति में जन्माष्टमी व्रत दूसरे ही दिन होगा।

विशेष: उपरोक्त मुहूर्त स्मार्त मत के अनुसार दिए गए हैं स्मार्त मत वाले प्रायः व्रत निर्णय उदयव्यापिनी तिथि को आधार मानकर ही करते है। वैष्णवों के मतानुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अगले दिन मनाई जाएगी। ध्यान रहे कि वैष्णव और स्मार्त सम्प्रदाय मत को मानने वाले लोग इस त्यौहार को अलग-अलग नियमों से मनाते हैं।

हिन्दू धर्मशास्त्रों के अनुसार वैष्णव वे लोग हैं, जिन्होंने वैष्णव संप्रदाय में बतलाए गए नियमों के अनुसार विधिवत दीक्षा ली है। ये लोग अधिकतर अपने गले में कण्ठी माला पहनते हैं और मस्तक पर विष्णुचरण का चिन्ह (टीका) लगाते हैं। इन वैष्णव लोगों के अलावा सभी लोगों को धर्मशास्त्र में स्मार्त कहा गया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि – वे सभी लोग, जिन्होंने विधिपूर्वक वैष्णव संप्रदाय से दीक्षा नहीं ली है, स्मार्त कहलाते हैं।

कृष्ण जन्माष्टमी का मुहूर्त
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जन्‍माष्‍टमी की तिथि: 23 अगस्‍त और 24 अगस्‍त।

अष्‍टमी तिथि प्रारंभ: 23 अगस्‍त 2019 को सुबह 08 बजकर 08 मिनट से।

अष्‍टमी तिथि समाप्‍त: 24 अगस्‍त 2019 को सुबह 08 बजकर 30 मिनट तक।

रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 24 अगस्‍त 2019 की सुबह 04 बजकर 15 मिनट से।

रोहिणी नक्षत्र समाप्‍त: 25 अगस्‍त 2019 को सुबह 07 बजकर 58 मिनट तक।

व्रत का पारण: जानकारों के मुताबिक जन्‍माष्‍टमी के पहले दिन यानी 23 अगस्त को व्रत रखने वालों को अष्‍टमी तिथि 24 अगस्त प्रातः 8 बजकर 30 मिनट पर खत्म होने पर किया जाना चाहिये। और जो भक्त लोग 24 अगस्त को व्रत रखेंगे उन्हें रोहिणी नक्षत्र के खत्‍म होने के बाद व्रत का पारण करना चाहिये।

SOMVATI AMAVASYA – सोमवती अमावस्या पर करे अकाट्य उपाय

Somvati Amavsya

गौ, ब्राह्मण, गर्भस्थ शिशु , स्त्री हत्या, विश्वासघात

तथा किसी के द्वारा दिए गए श्राप का अकाट्य उपाय

ओम नमः शिवाय,

सज्जनों,

ओम नमः शिवाय,

आज के इस एपिसोड में हम जानेंगे की बहुत सारे उपाय करने के उपरांत भी व्यक्ति को पूर्ण लाभ क्यों नहीं मिल पाता है सज्जनों शास्त्रों के अनुसार से यदि किसी व्यक्ति के महा पातक उदय हो रखे होते हैं तो उस व्यक्ति के महापातकों के कारण से पुण्य दब जाते हैं और व्यक्ति की पूजा पाठ तथा शुभ कर्म फलीभूत नहीं हो पाते। महा पातक कौन कौन से होते हैं गो, ब्राह्मण, गर्भस्थ शिशु, स्त्री हत्या, विश्वासघात, जघन्य अथवा क्रूर कर्म आदि तथा किसी के द्वारा दिया गया श्राप इन सब महापापों के कारण से व्यक्ति को पूर्ण लाभ नहीं मिल पाता। सोमवती अमावस्या पर एक ऐसा दुर्लभ संयोग बनता है। जिसके कारण से स्कंद पुराण, अग्नि पुराण तथा पदम पुराण में दिए गया अकाट्य उपाय करने से सभी प्रकार के महापातकों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति सुख की राह पर आगे बढ़ सकता है। आइए विस्तार से जानते हैं।

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दीपावली पूजन का शुभ मुहूर्त | Deepawali Pujan Shubh Muhurat

ओम नमः शिवाय,

सज्जनों,

दीपावली का पर्व आ गया है। किन किन राशि में जन्मे हुए अथवा किन-किन लग्न में जन्मे हुए व्यक्तियों को अपने कार्यस्थल पर किस मुहूर्त में पूजा अर्चना करनी चाहिए। यह आज के इस लेख में बताया गया है। शास्त्र की दृष्टि से जो समय बताया गया है। उस समय में अपनी राशि के अनुसार पूजा पाठ करने वाले को कई गुना फल की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं शुभ मुहूर्त के बारे में –

तुला राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए सुबह 7:28 से 9:48 तक

वृश्चिक राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त सुबह 9:48 से सुबह 11:53 तक

धनु राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त सुबह 11:53 से दोपहर 1:34 तक

मकर राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त दोपहर 1:34 से दोपहर 2:59 तक

कुंभ राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त दोपहर 2:59 से शाम 4:21 तक

मीन राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त दोपहर 4:21 से शाम 5:54 तक

मेष राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त शाम 5:54 से शाम 7:49 मिनट तक

वृषभ राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त शाम 7:59 से रात्रि 10:03 तक

मिथुन राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त रात्रि 10:03 से रात 12:25 तक

कर्क राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त 12:25 से रात्रि 2:45 तक

सिंह राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त रात 2:45 से सुबह 5:03 तक

कन्या राशि अथवा लग्न में जन्मे हुए जातकों के लिए मुहूर्त रात 5:03 से सुबह 7:24 तक

घर में दीपावली पूजन करने का मुहूर्त

शाम 7:59 से रात्रि 10:03 तक

यंत्र – मंत्र – तंत्र साधना करने का महत्वपूर्ण काल

निशिथ काल

रात 12:25 से रात्रि 2:45 तक

महानिशिथ काल

रात 2:45 से सुबह 5:03 तक

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 Diwali Pooja Muhurat / दिवाली पूजा मुहूर्त के बारे में यह artical यदि आपको पसंद आया हो, तो इसे like और दूसरों को share करें, ताकि यह जानकारी और लोगों तक भी पहुंच सके। आप Comment box में Comment जरुर करें। इस subject से जुड़े प्रश्न आप नीचे Comment section में पूछ सकते हैं।

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Pitra Puja|Shraddh paksh में पितरों के लिए यह अवश्य करें

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ओम नमः शिवाय

सज्जनों, जैसा कि हमने जाना हमने पिछले वीडियो में यह जाना था कि पितृ पक्ष में कौन से कार्य भूल कर भी नहीं करने चाहिए। इसी प्रकार से यह एक नया वीडियो बनाया गया है। जिसमें पितृपक्ष में कौन से कार्य अवश्य करनी चाहिए। किस प्रकार के उपाय करने से पितरों की प्रसन्नता और कृपा हम पर बनी रहती है। इस वीडियो में विस्तार से बताया गया है। आइए जानते हैं इसके बारे में


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