होली पर्व विशेष, होलिका दहन पूजा विधि तथा शुभ मुहूर्त | Holi Muhurat

Holi shubh muhurat

होलिका पर्व विशेष

होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई है इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है होलिका और प्रह्लाद की है। विष्णु पुराण की एक कथा के अनुसार प्रह्लाद के पिता दैत्यराज हिरण्यकश्यप ने तपस्या कर देवताओं से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि वह न तो पृथ्वी पर मरेगा न आकाश में, न दिन में मरेगा न रात में, न घर में मरेगा न बाहर, न अस्त्र से मरेगा न शस्त्र से, न मानव से मारेगा न पशु से। इस वरदान को प्राप्त करने के बाद वह स्वयं को अमर समझ कर नास्तिक और निरंकुश हो गया। उसने अपनी प्रजा को यह आदेश दिया कि कोई भी व्यक्ति ईश्वर की वंदना न करे। अहंकार में आकर उसने जनता पर जुल्म करने आरम्भ कर दिए… यहाँ तक कि उसने लोगो को परमात्मा की जगह अपना नाम जपने का हुकम दे दिया। कुछ समय बाद हिरण्यकश्यप के घर में एक बेटे का जन्म हुआ. उसका नाम प्रह्लाद रखा गया प्रह्लाद कुछ बड़ा हुआ तो, उसको पाठशाला में पढने के लिए भेजा गया पाठशाला के गुरु ने प्रह्लाद को हिरण्यकश्यप का नाम जपने की शिक्षा दी पर प्रह्लाद हिरण्यकश्यप के स्थान पर भगवान विष्णु का नाम जपता था वह भगवान विष्णु को हिरण्यकश्यप से बड़ा समझता था। गुरु ने प्रह्लाद की हिरण्यकश्यप से शिकायत कर दी हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को बुला कर पूछा कि वह उसका नाम जपने के जगह पर विष्णु का नाम क्यों जपता है प्रह्लाद ने उत्तर दिया, “ईश्वर सर्व शक्तिमान है, उसने ही सारी सृष्टि को रचा है.” अपने पुत्र का उत्तर सुनकर हिरण्यकश्यप को गुस्सा आ गया उसको खतरा पैदा हो गया कि कही बाकि जनता भी प्रह्लाद की बात ना मानने लगे उसने आदेश दिया कहा, “मैं ही सबसे अधिक शक्तिशाली हूं, मुझे कोई नहीं मर सकता मैं तुझे अब खत्म कर सकता हूँ” उसकी आवाज सुनकर प्रह्लाद की माता भी वहां आ गई उसने हिरण्यकश्यप का विनती करते हुए कहा, “आप इसको ना मारो, मैं इसे समझाने का यतन करती हूं” वे प्रह्लाद को अपने पास बिठाकर कहने लगी, “तेरे पिता जी इस धरती पर सबसे शक्तिशाली है उनको अमर रहने का वर मिला हुआ है इनकी बात मान ले ”प्रहलद बोला, “माता जी मैं मानता हूं कि मेरे पिता जी बहुत ताकतवर है पर सबसे अधिक बलवान भगवान विष्णु हैं जिसने हम सभी को बनाया है पिता जो को भी उसने ही बनाया है प्रह्लाद का ये उत्तर सुन कर उसकी मां बेबस हो गयी प्रहलद अपने विश्वास पर आडिग था ये देख हिरण्यकश्यप को और गुस्सा आ गया उसने अपने सिपाहियों को हुकम दिया कि वो प्रह्लाद को सागर में डूबा कर मार दें सिपाही प्रह्लाद को सागर में फेंकने के लिए ले गये और पहाड़ से सागर में फैंक दिया लेकिन भगवान के चमत्कार से सागर की एक लहर ने प्रह्लाद को किनारे पर फैंक दिया सिपाहियों ने प्रह्लाद को फिर सागर में फेंका… प्रह्लाद फिर बहार आ गया सिपाहियों ने आकर हिरण्यकश्यप को बताया फिर हिरण्यकश्यप बोला उसको किसी ऊंचे पर्वत से नीचे फेंक कर मार दो सिपाहियों ने प्रह्लाद को जैसे ही पर्वत से फेंका प्रह्लाद एक घने वृक्ष पर गिरा जिस कारण उसको कोई चोट नहीं लगी हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को एक पागल हाथी के आगे फैंका तो जो हाथी उसको अपने पैरों के नीचे कुचल दे पर हाथी ने प्रह्लाद को कुछ नहीं कहा लगता था जैसे सारी कुदरत प्रह्लाद की मदद कर रही हो। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था होलिका अपने भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी दूर करना चाहती थी होलिका को वरदान था कि उसको आग जला नहीं सकती उसने अपने भाई को कहा कि वो प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठ जाएगी वरदान के कारण वो खुद आग में जलने से बच जाएगी पर प्रह्लाद जल जायेगा लेकिन हुआ इसका उलट और आग में होलिका जल गयी पर प्रह्लाद बच गया होलिका ने जब वरदान में मिली शक्ति का दुरूपयोग किया, तो वो वरदान उसके लिए श्राप बन गया रंगों वाली होली (धुलंडी) के एक दिन पूर्व होलिका दहन होता है। होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है, परंतु यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि हिरण्यकश्यप की बहन होलिका का दहन बिहार की धरती पर हुआ था। जनश्रुति के मुताबिक तभी से प्रतिवर्ष होलिका दहन की परंपरा की शुरुआत हुई। मान्यता है कि बिहार के पूर्णिया जिले के बनमनखी प्रखंड के सिकलीगढ़ में ही वह जगह है, जहां होलिका भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर दहकती आग के बीच बैठी थी।इसी दौरान भगवान नरसिंह का अवतार हुआ था, जिन्होंने हिरण्यकश्यप का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सिकलीगढ़ में हिरण्यकश्य का किला था।यहीं भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए एक खंभे से भगवान नरसिंह अवतार लिए थे। भगवान नरसिंह के अवतार से जुड़ा खंभा (माणिक्य स्तंभ) आज भी यहां मौजूद है। कहा जाता है कि इसे कई बार तोड़ने का प्रयास किया गया। यह स्तंभ झुक तो गया, पर टूटा नहीं। अन्य कथा के अनुसार वैदिक काल में इस होली के पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता था। पुराणों के अनुसार ऐसी भी मान्यता है कि जब भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से होली का प्रचलन हु‌आ। होलिका दहन की रात्रि को तंत्र साधना की दृष्टि से हमारे शास्त्रों में महत्वपूर्ण माना गया है | और यह रात्रि तंत्र साधना व लक्ष्मी प्राप्ति के साथ खुद पर किये गए तंत्र मंत्र के प्रतिरक्षण हेतु सबसे उपयुक्त मानी गई है| तंत्र शास्त्र के अनुसार होली के दिन कुछ खास उपाय करने से मनचाहा काम हो जाता है। तंत्र क्रियाओं की प्रमुख चार रात्रियों में से एक रात ये भी है। मान्यता है कि होलिका दहन के समय उसकी उठती हुई लौ से कई संकेत मिलते हैं। होलिका की अग्नि की लौ का पूर्व दिशा ओर उठना कल्याणकारी होता है, दक्षिण की ओर पशु पीड़ा, पश्चिम की ओर सामान्य और उत्तर की ओर लौ उठने से बारिश होने की संभावना रहती है। शास्त्रों में उल्लेख है कि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को प्रदोषकाल में दहन किया जाता है। होलिका दहन में आहुतियाँ देना बहुत ही जरुरी माना गया है, होलिका में कच्चे आम, नारियल, भुट्टे या सप्तधान्य, चीनी के बने खिलौने, नई फसल का कुछ भाग गेंहूं, उडद, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर. आदि की आहुति दी जाती है है|

सावधानी

होलिका दहन की रात्रि तंत्र साधना की रात्रि होने के कारण इस रात्रि आपको कुछ सावधानियां रखनी चाहियें सफेद खाद्य पदार्थो के सेवन से बचें । होलिका दहन वाले दिन टोने-टोटके के लिए सफेद खाद्य पदार्थों का उपयोग किया जाता है। इसलिए इस दिन सफेद खाद्य पदार्थों के सेवन से बचना चाहिये। सिर को ढक कर रखें । उतार और टोटके का प्रयोग सिर पर जल्दी होता है, इसलिए सिर को टोपी आदि से ढके रहें। कपड़ों का विशेष ध्यान रखें । टोने-टोटके में व्यक्ति के कपड़ों का प्रयोग किया जाता है, इसलिए अपने कपड़ों का ध्यान रखें। विशेष । होली पर पूरे दिन अपनी जेब में काले कपड़े में बांधकर काले तिल रखें। रात को जलती होली में उन्हें डाल दें। यदि पहले से ही कोई टोटका होगा तो वह भी खत्म हो जाएगा।

होलिका दहन पूजा विधि

हिन्दु धार्मिक ग्रन्थों के अनुसार, होलिका दहन, जिसे होलिका दीपक और छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है, को सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष के समय, जब पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो, करना चाहिये। होली से ठीक एक माह पूर्व अर्थात् माघ पूर्णिमा को ‘एरंड’ या ‘गूलर’ वृक्ष की टहनी को गाँव के बाहर किसी स्थान पर गाड़ दिया जाता है, और उस पर लकड़ियाँ, सूखे उपले, खर-पतवार आदि चारों से एकत्र किया जाता है। पूजन करते समय आपका मुख उत्तर या पूर्व दिशा में हो। सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में होलिका में सही मुहर्त पर अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी जाती है। अग्नि प्रज्ज्वलित होते ही डंडे को बाहर निकाल लिया जाता है। यह डंडा भक्त प्रहलाद का प्रतीक है। इसके पश्चात नरसिंह भगवान का स्मरण करते हुए उन्हें रोली , मौली , अक्षत , पुष्प अर्पित करें। इसी प्रकार भक्त प्रह्लाद को स्मरण करते हुए उन्हें रोली , मौली , अक्षत , पुष्प अर्पित करें। होलिका धहन से पहले होलिका के चारो तरफ तीन या सात परिक्रमा करे और साथ में कच्चे सूत को लपेटे। होलिका पूजन के समय निम्न मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। “अहकूटा भयत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै: अतस्वां पूजयिष्यामि भूति-भूति प्रदायिनीम:” इस मंत्र का उच्चारण एक माला, तीन माला या फिर पांच माला विषम संख्या के रुप में करना चाहिए। इसके पश्चात् हाथ में असद, फूल, सुपारी, पैसा लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल तथा गूलरी की माला पहनाएं। विधि पंचोपचार की हो तो सबसे अच्छी है। पूजा में सप्तधान्य की पूजा की जाती है जो की गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर। होलिका के समय गेंहू एवं चने की नयी फसले आने लग जाती है अत: इन्हे भी पूजन में विशेष स्थान दिया जाता है। होलिका की लपटों से इसे सेक कर घर के सदस्य खाते है और धन धन और समृधि की विनती की जाती है।

होलिका दहन का शास्त्रोक्त नियम

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए –

    1.   पहला, उस दिन “भद्रा” न हो। भद्रा का ही एक दूसरा नाम विष्टि करण भी है, जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।

    2.   दूसरा, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।

होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।

होलिका दहन शुभ मुहूर्त

होलिका दहन सोमवार, मार्च 9, 2020 को

होलिका दहन मुहूर्त – 06:26 पी एम से 08:52 पी एम : अवधि – 02 घण्टे 26 मिनट्स

भद्रा पूँछ – 09:37 ए एम से 10:38 ए एम

भद्रा मुख – 10:38 ए एम से 12:19 पी एम

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ – मार्च 09, 2020 को 03:03 ए एम बजे

पूर्णिमा तिथि समाप्त – मार्च 09, 2020 को 11:17 पी एम बजे

रंगवाली होली (धुलंडी) – 10 मार्च 2020

होलाष्टक क्या है ? होली मुहूर्त ? Holashtak | Holi Shubh Muhurat

holi shubh muhurat

ओम नमः शिवाय, सज्जनों आज के इस वीडियो में आप जानेंगे कि होलाष्टक क्या है ? होली से पहले 8 दिनों में क्या करना चाहिए ? क्या नहीं करना चाहिए? उसका क्या अच्छा और बुरा प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है ? उस बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए हमें क्या करना है ? होली रंगों का त्योहार है किन रंगों के द्वारा होली खेलने से आयु तेज बल में वृद्धि होती है ? रोग-शोक का नाश होता है ? सन 2018 में होलिका दहन का शुभ मुहूर्त क्या है ? आइए जानते हैं इन सब चीजों के बारे में बातों के बारे में।


प्रतिदिन ज्योतिष से संबंधित नया वीडियो पाने के लिये हमारा यूट्यूब चैनल https://www.youtube.com/c/ASTRODISHA सबस्‍क्राइब करें। इसके अलावा यदि आप हमारी संस्था के सेवा कार्यों तथा प्रोडक्ट्स से संबंधित अधिक जानकारी प्राप्‍त करना चाहते हैं तो आप हमारी बेवसाइट https://www.astrodisha.com/ पर जा सकते हैं और अगर आपको कुछ पूछना है तो आप हमें help@astrodisha.com पर मेल कर सकते है।


Contact – +91-7838813444, +91-7838813555,
+91-7838813666, +91-7838813777

Whats app – +91-7838813444


Email – help@astrodisha.com
Website – https://www.astrodisha.com
Facebook – https://www.facebook.com/AstroDishaPtSunilVats/

holashtak date , holi muhurat, holashtak start and end date,  holika ashtak , What is holashtak ? auspicious holi muhurat

HOLI | होली का संदेश

होली का मतलब है, जो हो गया सो हो गया।

किसी कवि ने बड़ा ठीक कहा है।

बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि ले।

holi

जीवन में हमसे जो गलतियां हुई हैं। जो कमियां हमने की हैं। जो असफलता हमने पाई है। जो धोखा हमने खाया है। जो नुकसान हमने सहा है।

उन सभी से सीख लेते हुए आगे बढ़ें। बीते हुए जीवन में आई हुई परेशानियों को याद करते हुए सिर पर हाथ रखकर ना बैठे रहें। अपने भाग्य को अथवा विपरीत परेशानियों को ना कोसते रहे यही संदेश देती है होली।

होली की शुरुआत भक्त प्रल्हाद से शुरू हुई। आपके और हमारे जीवन में क्या परेशानियां आई ?

क्या भक्त प्रल्हाद से भी बड़ी ?

आप को किसने धोखा दिया ? रिश्तेदार ने ?  मित्र ने ? या दुश्मन ने ? पिता ने तो नहीं दिया ?

पर भक्त प्रह्लाद को तो पिता ने ही धोखा दे दिया।

आपको किसने नष्ट करने की कोशिश की ? आपके दुश्मन ने ?

पर भक्त प्रह्लाद को तो उनके पिताजी ने ही नष्ट करने की कोशिश की ।

क्या आपको पहाड़ से फेंका गया ? अथवा अग्नि में जलाया गया ? क्या हाथी तले रौंद ने की कोशिश की गई ? क्या आपको भगवान का नाम लेने से उनकी प्रार्थना करने से किसी ने रोका है ?

नहीं ना ?

तो हम से तो बहुत अधिक दुख भक्त प्रह्लाद को झेलने पड़े और उन्होंने भगवान के नाम का आश्रय लेते हुए। भगवान की भक्ति का आश्रय लेते हुए। भगवान के मंत्रों का जाप जपते हुए।

इतने गहन दुख अपने ऊपर झेल लिए बल्कि वह तो भगवान की भक्ति में, भगवान के मंत्र जाप में इतने रमे हुए थे कि उन्हें दुख की अनुभूति भी नहीं हुई। तो सोचिए कितना गहन विश्वास होगा उनका भगवान के प्रति।

क्या हमारा ऐसा विश्वास है हमारे धर्म में ? हमारे शास्त्रों में ? हमारे इष्टदेव में ? हमारे गुरु में अथवा हमारे मंत्र में ?

अगर हम इस बात को तोल कर देखें तो हम कहां पाएंगे अपने आपको। यह बात किसी को बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि व्यक्ति अपने आप इस बात की अनुभूति कर सकता है।

जिसके घर में राक्षस भरे हुए हो ? जो हर समय नकारात्मक प्रभाव डाल रहे हो ? इसके बावजूद भी जो अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है। उसको कोई नहीं रोक सकता और परमात्मा स्वयं उसके लिए नरसिंह अवतार धारण करके उसके जीवन में आ रहे संकटों का खात्मा करते हैं, तो होली सिर्फ इसी बात का संदेश देने के लिए आती है, कि जो हो गया, सो हो गया।

जो हो लिया, सो हो लिया। अब जीवन में आई हुई परिस्थितियों से सबक सीखते हुए हमें आगे बढ़ना चाहिए।

इसीलिए कहा भी गया है ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले।’

क्या हाय-हाय करने से अथवा मैं दुखी, मैं दुखी करने से हमारे दुख दूर हो जाएंगे ? क्या कोई आकर हमें आगे बढ़ा देगा ? कौन हमें सहारा देगा ? याद रखिए सुखी, खुश और चमकते हुए चेहरे के पास ही कोई जाना पसंद करता है। उसको देखना पसंद करता है। उससे बात करना पसंद करता है।

दुखिया के पास कोई नहीं जाता। उससे कोई नहीं बात करता। उसकी तरफ कोई देखता भी नहीं। हम और आप मंदिर में जाते हैं। उस परमात्मा के घर में जाते हैं। वहां परमात्मा की बहुत सुंदर मूर्तियां होती हैं, तो क्या परमात्मा का चेहरा दुखी अवस्था का दिखता है ? क्या वह परेशान दिखते हैं ? नहीं ना जबकि हर एक अवतार ने बहुत संघर्ष किया है अपने जीवन में। फिर भी उनके चेहरे पर चमक होती है। खुशी होती है। आनंद होता है। प्रसन्नता होती है। मधुरता होती है।

वह हमें इसी बात का संदेश देने के लिए अवतार रूप में आते हैं, की परिस्थितियां चाहे कैसी भी हो, व्यक्ति को कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। हमेशा अपने आत्म बल को याद करके आगे बढ़ते रहना चाहिए। ना तो दुनिया की चकाचौंध में फसना चाहिए। वाहवाही में ठहरना नहीं और कोई निंदा चुगली करें हमारे लिए बुरा बोले तो उसमें फसना नहीं।

जो बात जुबान से निकल गई, उस बात का पीछा कौन करे।

जो तीर कमान से निकल गया, उस तीर का पीछा कौन करे।

क्या भगवान राम की किसी ने निंदा नहीं की ? क्या उनके लिए किसी ने अपशब्द नहीं बोले ? क्या सतयुग में नहीं बोले ? द्वापर में नहीं बोले या अब कलयुग में नहीं बोलते ? उनके सामने भी बोला और उनके बाद भी बोला, पर क्या इससे भगवान की महिमा कम हो गई। इसी तरह हमें भी उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए अपने जीवन पथ में आ रही तमाम परिस्थितियों से लड़ते हुए आगे बढ़ना है।

यही बात हमें होली सिखाती है। भक्त प्रह्लाद के भी जीवन में अनेक विघ्न और संकट आए परंतु वह डटे रहे और आखिर में स्वयं भगवान नरसिंह ने उनको अपनी गोद में बैठाया अर्थात सभी दुखों से मुक्त कर दिया।

सावधान

आज के समय में बहुत से लोग होली नहीं खेलते, बल्कि होली के नाम पर दुश्मनी खेलते हैं। आप सभी सज्जनों को मेरी ओर से यह प्रार्थना है कि बड़े ही संयम के साथ होली खेलें। होली से 8 दिन पहले ही होलाष्टक आरंभ हो जाता है। इस समय ग्रह चाल के कारण से कुछ शक्तियां बड़ी प्रबल हो जाती हैं। इसीलिए अनेक प्रकार की सिद्धियां, यंत्र – मंत्र – तंत्र का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाता है। इन सावधानियों में मुख्य रूप से किसी के यहां भोजन आदि नहीं करना चाहिए। यदि करते भी हैं तो नमकीन भोजन कर सकते हैं। मीठा अथवा तरल जैसे जूस अथवा दूध आदि का सेवन तो भूल कर भी ना करें।

जिस पर आपको शक है। उसके यहां ना जाए। मध्याहन, संध्या काल अथवा रात्रि काल में चौराहे आदि को न लाघें।  इस बात का पूर्ण रुप से ध्यान रखें कि किसी का दिया हुआ प्रसाद स्वीकार तो जरूर करें, पर उसका सेवन ना करें। उसे किसी एकांत और पवित्र स्थान पर किसी पेड़ आदि के नीचे रख दें। उसके बाद हाथ मुंह धो कर जल का छीटा अपने ऊपर मार लें।

हर्बल होली

अब बात आती है होली खेलने की। आजकल बहुत सारे कृत्रिम और रासायनिक रंगों से होली खेली जाती है। जो कि हमारे तन, मन, शरीर-स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है। क्योंकि हानिकारक रसायन त्वचा के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश करता है और उससे अनेक प्रकार के बीमारियां होती हैं।

हर्बल होली खेलने की परंपरा आदि काल से ही है। आज मैं आपको हर्बल रंग बनाने की विधि बताता हूं।

सामग्री

100 ग्राम टेसू के फूल, 50 ग्राम गुलाब की पत्तियां और एक शीशी सर्व औषधी ले लीजिए।  यह सभी सामान आपको पंसारी की दुकान पर मात्र 50-60 रुपए में रुपए में मिल जाएगा।  एक बर्तन में 4 – 5 लिटर पानी भरकर यह तीनों सामान उसमे डाल दीजिए और पानी को गर्म कर दीजिए। पानी में एक उबाला आने के बाद ठंडा करके पानी छान लीजिए। यह बन गया आपका हर्बल रंग। जो कि आपके स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा रहेगा। अब आप कपड़ों सहित इस रंग को अपने, परिवार के सदस्यों, मित्रों व अपने प्रिय जनों के ऊपर डाल सकते हैं। ध्यान रहे – कपड़े को भीगा रहने दें। जितनी ज्यादा देर तक हर्बल रंग से भीगा कपड़ा हमारे शरीर से लगा रहेगा उतना ज्यादा यह यह फूलों और औषधियों का रस हमारे शरीर के अंदर जाएगा। यह हर्बल रंग रोमकूपों को खोलेगा।

आप सभी को पता है कि होली के बाद ग्रीष्म ऋतु आती है। जिसमें लू लगने के चांस बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं। परंतु यह हर्बल रंग आने वाली भीषण गर्मी से आपकी रक्षा करता है।

टेसू के फूल ठंडे होते हैं और साथ ही गुलाब जल भी ठंडा होता है। आने वाली गर्मियों के लिए यह आपके लिए अमृत के समान होगा। गर्मी अधिक नहीं लगेगी। लू लगना, मितली आना, उल्टी आना जैसे रोगों की शांति होगी और भी बहुत सारे लाभ आपको मिलेंगे।

भोजन

इस दिन  चिकना – चुपड़ा अथवा तला हुआ भोजन खाने का रिवाज भी सदियों पुराना है। उसका भी अपना एक कारण है, क्योंकि होली से पहले सर्दी की ऋतु जाती है। त्वचा बहुत अधिक खुश्क, रूखी – सुखी व बेजान हो जाती है।  इसीलिए तला, चिकना – चुपड़ा भोजन खाने से शरीर की खुश्की दूर होकर तरलता व चिकनापन आता है। जिससे शरीर की शुद्धि होती है और शरीर खुल जाता है। घर के बनाए हुए तेल आदि में अगर हम पकवान पकाते हैं। तला हुआ खाते हैं, तो यह हमारे शरीर के लिए अच्छा रहता है। आप भी खाएं और औरों को भी खिलाएं। यह तन और मन दोनों को प्रफुल्लित करता है।

हुल्लड, नाच गान

आपने देखा होगा उस दिन बहुत सारे लोग खूब हो-हल्ला करके हुल्लड़ और नाच गान करते हैं। ऐसा करने की भी पुरानी परंपरा है इसके पीछे भी ऋषि मुनियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। इस दिन हम भगवान के नाम का भी हुल्लड़ और नाच गान सकते हैं। उनके नाम की पुकार कर सकते हैं। भजन गाकर नाच गान कर सकते हैं। क्योंकि जोर जोर से बोलने व नाचने से हमारे शरीर में जमा हुआ कफ जल्दी पिघलता है। इससे हमारा शरीर खुल जाता है। एकदम स्वस्थ और तरो – ताजा हो जाता है। शरीर में तेज – ओज – बल की वृद्धि होती है।

सज्जनों आप अगर देखेंगे कि हमारे जितने भी तीज – त्यौहार हैं। उन सब का कोई न कोई महत्व है। वह कोई न कोई संदेश देते हैं। त्यौहार मनाना भारतीय परंपरा के अनुसार हर एक व्यक्ति के लिए शुभ होता है। भले ही वह हमें नहीं दिखता, परंतु इसके बहुत सारे वैज्ञानिक दृष्टिकोण हैं।

भले ही हमारे ऋषि – मुनि जंगलों में रहते थे। एकांत जीवन जीते थे। परंतु उन्होंने मनुष्य मात्र के भले के लिए ऐसे त्योहारों का आयोजन किया। जिससे व्यक्ति अपने जीवन में आनंद और प्रसन्नता प्राप्त कर सके।

आप देखेंगे कि लगभग सभी तीज – त्यौहार आनंद और प्रसन्नता ही देते हैं । खुशी का माहौल बनता है। लोग एक दूसरे से मिलते हैं। जान पहचान होती है। गिले शिकवे दूर होते हैं और परस्पर प्रेम बढ़ता है। इसलिए हमें अपने सभी त्योहार पूरी श्रद्धा और आदर के साथ मनाने चाहिए। साथ ही अगर उन त्योहारों के संदेश हमें पता हो तो इसका आनंद ही अलग हो जाता है।

नमः शिवाय

आप सभी को होली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। आपके जीवन में जो भी समस्याएं हैं। जो विपरीत परिस्थितियां हैं। भगवान करे उन सभी की होली हो जाए अर्थात वह जलकर भस्म हो जाए।

जिस प्रकार प्रह्लाद भक्त प्रल्हाद धधकती हुई अग्नि से सकुशल बाहर आ गए थे इसी तरह आप भी विपरीत परिस्थितियों से सकुशल बाहर आ जाएं। ऐसी मेरी भगवान से प्रार्थना है। आप सभी लोगों का मंगल हो। आप का कल्याण हो।

•••••••••••••••••

 

HOLI / होली के बारे में यह article यदि आपको पसंद आया हो तो इसे दूसरों को share और like जरुर करें। नीचे दिए Comment box में Comment जरुर करें । ज्योतिष, अध्यात्म, वास्तु , हस्तरेखा, अंक – विज्ञान पूजा – पाठ, यंत्र – मंत्र – तंत्र, रत्न व अन्य उपायों से संबंधित किसी भी प्रश्न के लिए आप संपर्क कर सकते हैं।

Holi festival meaning, holi wishes, holy color festival, color festival holi,holi, holi ka tyohaar, Holi Messages, Message from Holi, holi festival, holi , holi festival india , holi essay, holi in hindi, history of holi, holi video, holi festival information, holi pictures, holi movie, holi ka sandesh