गणेश चतुर्थी विशेष | सभी कष्टों व संकटों से मुक्ति दिलाने वाला कलंक निवारिणी उपाय

syamantak mani ki katha

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भगवान गणेश जी के जन्म दिन के उत्सव को गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) के दिन, भगवान गणेश जी को बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के देवता के रूप में पूजा जाता है। भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष के दौरान भगवान गणेश जी का जन्म हुआ था। भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष में मध्याह्न के समय भगवान गणपति जी का जन्म हुआ था। इसलिए मध्याह्न का समय भगवान गणपति जी की पूजा के लिए सर्वोत्तम माना गया है।

गणेशोत्सव अर्थात गणेश चतुर्थी का उत्सव, 10 दिन के बाद, अनन्त चतुर्दशी के दिन समाप्त होता है और यह दिन गणेश विसर्जन के नाम से मनाया जाता है। अनन्त चतुर्दशी के दिन श्रद्धालु जन बड़े ही धूम धाम के साथ नगर में भजन यात्रा निकालते हुए भगवान गणेश जी की प्रतिमा का सरोवर, झील, नदी इत्यादि में विसर्जन करते हैं।

गणेश चतुर्थी व्रत की कथा | Ganesh Chaturthi Vrat Katha

एक बार भगवान शंकर स्नान करने के लिए भोगवती नामक नदी पर गए। उनके चले जाने के पश्चात पार्वती जी ने अपने तन की मैल से एक पुतला बनाया जिसका नाम उन्होंने गणेश रखा। गणेश को द्वार पर एक मुदगर देकर बैठाया कि जब तक मैं स्नान करूं तब तक किसी पुरुष को अंदर मत आने देना।

भोगवती पर स्नान करने के बाद जब भगवान शंकर आए तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर ही रोक दिया। क्रुद्ध होकर भगवान शंकर ने उनका सिर धड़ से अलग कर दिया और अंदर चले गए। पार्वती जी ने समझा कि भोजन के विलंब होने के कारण शंकर जी नाराज हैं। उन्होंने फौरन दो थालियों में भोजन परोस कर शंकर जी को भोजन करने को बुलाया। शंकर जी ने दो थाल देखकर पूछा- “दूसरा थाल किसके लिए लगाया है?” पार्वती जी बोली- “दूसरा थाल पुत्र गणेश के लिए है जो बाहर पहरा दे रहा है।” यह सुनकर शंकर जी ने कहा- “मैंने तो उसका सिर काट दिया है।” यह सुनकर पार्वती जी बहुत दु:खी हुई और प्रिय पुत्र गणेश को पुन: जीवित करने की प्रार्थना करने लगी। शंकर जी ने तुरंत के पैदा हुए हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। तब पार्वती जी ने प्रसन्नता पूर्वक पति-पुत्र को भोजन कराकर स्वयं भोजन किया। यह घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी, इसलिए इसका नाम गणेश चतुर्थी पड़ा।

गणेश चतुर्थी के दिन चांद क्यों नहीं देखना चाहिए?

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्र दर्शन वर्ज्य होता है। इस दिन चन्द्र के दर्शन करने से मिथ्या दोष अथवा मिथ्या कलंक लगता है ।
एक बार कुबेर जी ने भगवान शंकर तथा माता पार्वती जी के पास भोजन का आमंत्रण लेकर कैलाश पर्वत पहुंचे। वे चाहते थे कि शिवजी तथा पार्वती जी उनके महल आकर उनके यहां भोजन करें, लेकिन शिव जी कुबेर के आमंत्रण का कारण समझ गए। वे जानते थे कि कुबेर केवल अपनी धन-संपत्ति का दिखावा करने के लिए उन्हें महल में आमंत्रित कर रहे हैं। इसीलिए उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य में व्यस्त होने का कारण बताते हुए आने से मना कर दिया। पार्वती जी ने भी कहा की यदि उनके स्वामी नहीं जा रहे, तो हम भी अकेले नहीं आ सकते । ऐसे में कुबेर दुखी हो गए और भगवान शिव से प्रार्थना करने लगे। तब शिवजी मुस्करा कर बोले कि यदि आपको हमारी सेवा ही करनी है, तो आप मेरे पुत्र गणेश को साथ ले जाएं। गणेश आपको सेवा का पूर्ण मौका देंगे। अंत में कुबेर गणेश जी को ही ले जाने के लिए राजी हो गए। गणेशजी ने कुबेर के महल में पेट भरकर भोजन किया।

कुबेर ने गणेश जी को खूब मिष्ठान्न खिलाए, लेकिन इतनी मिठाइयां खाने के बाद भी उनका मन नहीं भरा और वे सोचने लगे कि यहां से निकलते समय वे कुछ मिठाइयां अपने ज्येष्ठ भ्राता कार्तिकेय के लिए ले जाएंगे और कुछ स्वयं भी खा लेंगे। गणेश जी ने बहुत सी मिठाइयों को अपनी गोद में रखा और अपने मूषक पर सवार होकर चलने लगे। तभी गणेशजी के मूषक ने मार्ग में एक सर्प देखा और वह भय से उछल पड़ा। इस कारण गणेशजी अपना संतुलन खो बैठे और नीचे गिर पड़े। परिणामस्वरूप उनकी सारी मिठाइयां भी धरती पर बिखर गईं। गणेश जी अपनी मिठाइयों को एकत्रित कर ही रहे थे कि उन्हें हंसने की आवाज सुनाई दी। उन्होंने यहां-वहां देखा, तो उन्हें कोई न दिखा, लेकिन जैसे ही उनकी आंखें आकाश पर पड़ीं, तो उन्होंने चंद्रमा को हंसते हुए देखा। गणेश जी विचार करने लगे कि उनकी मदद करने के स्थान पर चंद्रमा उनका मजाक बना रहा है। चंद्रमा को हंसते देख गजमुख को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने चंद्र देव को तुरंत श्राप दे दिया। हे चंद्र! अब तुम किसी के देखने योग्य नहीं रह जाओगे और यदि किसी ने तुम्हें देख लिया, तो वह पाप का भागी होगा। ऐसा कहकर गजकर्ण वहां से चले गए।

गणेश जी श्राप के प्रभाव से उसी समय चन्द्रमा की आभा चली गयी और सम्पूर्ण जगत में रात्रि का अँधेरा छा गया। चंद्रदेव घबराकर उनकी शरण में आ गये और उनके पाँव पकड़कर क्षमा याचना करने लगे। वे बोले, हे देव मुझ पापी को क्षमा करें, मैं अनजाने में ऐसा कृत्य कर बैठा। यदि आपने अपना श्राप वापस नहीं लिया तो उनके होने का कोई महत्व नहीं रहेगा, जो कार्य उन्हें सौंपा गया है, वह वो नहीं कर पायंगे। और इस से सृष्टि का भी नियम भंग होगा​।​ हे देव, अतः मुझे क्षमा करें।​

फिर गणेश जी ने भी स्थिति देखि तो उनका क्रोध शांत हुआ। उन्होंने कहा चंद्रदेव आपको अपनी गलती का भान हुआ यह अच्छी बात है। किन्तु दिया हुआ श्राप वापस नहीं हो सकता ये आप भी जानते हैं। हाँ इसका उपाय किया जा सकता है, अतः श्राप के अनुसार तुम्हारी आभा खो जायगी किंतु माह में केवल एक दिन, इसके बाद तुम धीरे धीरे अपनी पूर्ण आभा वापस पा लोगे। और जो सुंदरता खोने का श्राप है उसके कारण तुम पूर्णतया अपना रूप नहीं खोओगे, किन्तु तुम्हारे चेहरे पर कुछ दाग रह जायँगे जो तुम्हे तुम्हारी गलती की याद भी दिलाते रहेंगे।​

गणेश जी की कृपा से चंद्रदेव प्रसन्न हुए और उनका आभार प्रकट करने लगे।​ किन्तु गणेश जी ने कहा की मेरा ये श्राप मैंने कम अवश्य कर दिया है, किन्तु तुमने जो मेरा अपमान किया है।​ उसके कारण मैं दुखी हूँ। आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन तुमने मेरा अपमान किया है तो अब से आज के दिन कोई भी तुम्हारा दर्शन करेगा यह उसके लिए अशुभ होगा।​ इसी श्राप के कारण आज के दिन चंद्रमा का दर्शन करना कलंक लगाने वाला होता है। कहीं-कहीं इस दिन लोग चांद की ओर पत्थर उछालते हैं। इसलिए इसे कलंक चतुर्थी (Kalank Chaturthi) अथवा पत्थर चौथ (Pathar Choth) के नाम से भी जाना जाता है।

गलती से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्र दर्शन हो जाये तो क्या करें ?

सिंह: प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हत:।

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तक:।।

भाद्रपद (भादों) मास की गणेश-जन्म चतुर्थी के दिन चंद्र का दर्शन करना निषेध किया गया है किंतु अनायास चंद्रमा दिखलाई पड़ने पर किसी भी प्रकार का कलंक दोष लगने का भय बना रहता है। इस दोष से मुक्ति-प्राप्ति के लिए ऊपर लिखे मंत्र का 21 बार केवल 1 दिन पाठ करने से कलंक दोष नहीं लगता।

यदि भूल से भादों चौथ का चंद्रमा दिख जाय तो ‘श्रीमदभागवत’ के १०वे स्कंध, ५६-५७वे अध्याय में दी गयी ‘स्यमंतक मणि की चोरी’ की कथा का आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिए |

 

स्यमन्तक मणि की कथा | Story of Syamantak Mani

भगवान कृष्ण पर स्यमन्तक नाम की कीमती मणि चोरी करने का झूठा आरोप लगा था। झूठे आरोप में लिप्त भगवान कृष्ण की स्थिति देख के, नारद ऋषि ने उन्हें बताया कि भगवान कृष्ण ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखा था। जिसकी वजह से उन्हें मिथ्या दोष का श्राप लगा है।

नारद ऋषि ने भगवान कृष्ण को आगे बतलाते हुए कहा कि भगवान गणेश ने चन्द्र देव को श्राप दिया था कि जो व्यक्ति भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दौरान चन्द्र के दर्शन करेगा। वह मिथ्या दोष से अभिशापित हो जायेगा और समाज में चोरी के झूठे आरोप से कलंकित हो जायेगा। नारद ऋषि के परामर्श पर भगवान कृष्ण ने मिथ्या दोष से मुक्ति के लिये गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) का व्रत किया और मिथ्या दोष से मुक्त हो गये।

‘श्रीमदभागवत’ 10वा स्कंध, 56-57 अध्याय

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स्यमन्तक मणि की कथा | गणेश चौथ का चाँद दिख जाये तो कलंक से बचने के लिए

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Bhadrapada Kalank Chaturthi Katha in Hindi | कलंक चतुर्थी

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क्या आपके ऊपर लगा है झूठा इल्जाम, तो करें यह एक अचूक उपाय

सज्जनों, आज के इस वीडियो में हम जानेंगे कि कई बार व्यक्ति के जीवन में झूठे आरोप, षड्यंत्र, इल्जाम आदि लगते हैं। ऐसा क्या कारण होता है कि व्यक्ति के जीवन में इस प्रकार का अशुभ योग बनता है तथा इन सभी परेशानियों से निजात दिलाने के लिए क्या उपाय करना चाहिए ? आइए जानते हैं आज के इस वीडियो में।

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