Hawan Kaise Kare -Vidhi | संकट नाशक सामग्री से कामण-टूमण नाशक हवन

hawan kaise kare
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ओम नमः शिवाय

सज्जनों,

आज के इस वीडियो में हम जानेंगे कि

संकटनाशक सामग्री क्या है ?

संपूर्ण हवन की विधि क्या है ?

नव ग्रहों की शांति के लिए किस लकड़ी से हवन करने करना चाहिए ?

अग्नि में आहुतियां किन अंगुलियों से तथा कितनी मात्रा में डालनी चाहिए ?

संकट नाशक सामग्री (Sankat Nashak / Nashan Hawan Samagri) के द्वारा कामण-टूमण (Kaman Tuman) नाशक हवन किस प्रकार करना चाहिए ?

आसन किसका होता है और जिस आसन पर बैठकर पूजा पाठ करते हैं। उसके नीचे जल डालकर क्यों उठना चाहिए ?

इसके अलावा हवन से संबंधित और भी बहुत से भ्रमों का निवारण करने वाली बहुत सी जानकारी आपको इस वीडियो में प्राप्त होगी। आइए देखते हैं, आज के इस वीडियो को

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Jyestha Apra Ekadashi Vrat Katha | ज्येष्ठ कृष्णा अपरा एकादशी व्रत कथा |

apra ekadashi vrat katha

apra ekadashi vrat katha

।। ज्येष्ठ मास कृष्णपक्ष एकादशी व्रत कथा ।।
अपरा एकादशी

Jyestha Apra Ekadashi Vrat Katha

अपरा एकदाशी की कथा सुनने के लिए
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युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! ज्येष्ठ मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूँ । उसे बताने की कृपा कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आपने सम्पूर्ण लोकों के हित के लिए बहुत उत्तम बात पूछी है । राजेन्द्र ! ज्येष्ठ (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार वैशाख ) मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अपरा’ है । यह बहुत पुण्य प्रदान करनेवाली और बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है । ब्रह्महत्या से दबा हुआ, गोत्र की हत्या करनेवाला, गर्भस्थ बालक को मारनेवाला, परनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से निश्चय ही पापरहित हो जाता है । जो झूठी गवाही देता है, माप तौल में धोखा देता है, बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता है और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैद्य का काम करता है… ये सब नरक में निवास करनेवाले प्राणी हैं । परन्तु ‘अपरा एकादशी’ के सवेन से ये भी पापरहित हो जाते हैं ।

यदि कोई क्षत्रिय अपने क्षात्रधर्म का परित्याग करके युद्ध से भागता है तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होने के कारण घोर नरक में पड़ता है । जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरुनिन्दा करता है, वह भी महापातकों से युक्त होकर भयंकर नरक में गिरता है । किन्तु ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से ऐसे मनुष्य भी सदगति को प्राप्त होते हैं । माघ में जब सूर्य मकर राशि पर स्थित हो, उस समय प्रयाग में स्नान करनेवाले मनुष्यों को जो पुण्य होता है, काशी में शिवरात्रि का व्रत करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करनेवाला पुरुष जिस पुण्य का भागी होता है, बृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने पर गोदावरी में स्नान करनेवाला मानव जिस फल को प्राप्त करता है, बदरिकाश्रम की यात्रा के समय भगवान केदार के दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवन से जो पुण्य फल उपलब्ध होता है तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणासहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, ‘अपरा एकादशी’ के सेवन से भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है । ‘अपरा’ को उपवास करके भगवान वामन की पूजा करने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है । इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है ।

हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि एकादशी व्रत करने वाले के समस्त पापों का नाश हो जाता है। प्रभु इस व्रत से प्रसन्न होकर साधक को अनंत पुण्य देते हैं। ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। इस एकादशी को अपरा एकादशी के नाम से जाना जाता है। अपरा एकादशी का एक अर्थ यह कि इस एकादशी का पुण्य अपार है।

इस एकादशी का व्रत करने से लोग पापों से मुक्ति होकर भवसागर से तर जाते हैं। पुराणों में एकादशी के व्रत के बारे में कहा गया है कि व्यक्ति को दशमी के दिन शाम में सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए। रात में भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। एकादशी के दिन सुबह उठकर, स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। पूजा में तुलसीदल, श्रीखंड चंदन, गंगाजल व फलों का प्रसाद अर्पित करना चाहिए। व्रत रखने वाले को पूरे दिन परनिंदा, झूठ, छल-कपट से बचना चाहिए। जो लोग किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं, उन्हें एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए। जो व्यक्ति एकादशी के दिन ‘विष्णुसहस्रनाम’ का पाठ करता है, उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। व्रत कथा इस प्रकार है:-

महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। राजा का छोटा भाई वज्रध्वज बड़े भाई से द्वेष रखता था। एक दिन मौका पाकर इसने राजा की हत्या कर दी और जंगल में एक पीपल के नीचे शव को गाड़ दिया। अकाल मृत्यु होने के कारण राजा की आत्मा प्रेत बनकर पीपल पर रहने लगी। मार्ग से गुजरने वाले हर व्यक्ति को आत्मा परेशान करती थी।

एक दिन एक ऋषि इस रास्ते से गुजर रहे थे। इन्होंने प्रेत को देखा और अपने तपोबल से उसके प्रेत बनने का कारण जाना। ऋषि ने पीपल के पेड़ से राजा की प्रेतात्मा को नीचे उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया। राजा को प्रेत योनी से मुक्ति दिलाने के लिए ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा। द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर व्रत का पुण्य प्रेत को दे दिया। एकादशी व्रत का पुण्य प्राप्त करके राजा प्रेतयोनी से मुक्त हो गया और स्वर्ग चला गया।

।। बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय ।।

।। श्री एकादशी माता की जय ।।

 

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Vaishakh Mohini Ekadashi Vrat Katha | वैशाख शुक्ला मोहिनी एकादशी व्रत कथा

vaishakh maas

vaishakh maas

 

।। वैशाख शुक्ल एकादशी व्रत कथा ।।
मोहिनी एकादशी

Vaishakh Mohini  Ekadashi Vrat Katha

मोहिनी एकदाशी की कथा सुनने के लिए
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युधिष्ठिर ने पूछा: जनार्दन ! वैशाख मास के शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? उसका क्या फल होता है? उसके लिए कौन सी विधि है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले: धर्मराज ! पूर्वकाल में परम बुद्धिमान श्रीरामचन्द्रजी ने महर्षि वशिष्ठजी से यही बात पूछी थी, जिसे आज तुम मुझसे पूछ रहे हो ।

श्रीराम ने कहा: भगवन् ! जो समस्त पापों का क्षय तथा सब प्रकार के दु:खों का निवारण करनेवाला, व्रतों में उत्तम व्रत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ ।

वशिष्ठजी बोले: श्रीराम ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है । मनुष्य तुम्हारा नाम लेने से ही सब पापों से शुद्ध हो जाता है । तथापि लोगों के हित की इच्छा से मैं पवित्रों में पवित्र उत्तम व्रत का वर्णन करुँगा ।

वैशाख मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका नाम ‘मोहिनी’ है । वह सब पापों को हरनेवाली और उत्तम है । उसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोहजाल तथा पातक समूह से छुटकारा पा जाते हैं ।

सरस्वती नदी के रमणीय तट पर भद्रावती नाम की सुन्दर नगरी है । वहाँ धृतिमान नामक राजा, जो चन्द्रवंश में उत्पन्न और सत्यप्रतिज्ञ थे, राज्य करते थे । उसी नगर में एक वैश्य रहता था, जो धन धान्य से परिपूर्ण और समृद्धशाली था । उसका नाम था धनपाल । वह सदा पुण्यकर्म में ही लगा रहता था । दूसरों के लिए पौसला (प्याऊ), कुआँ, मठ, बगीचा, पोखरा और घर बनवाया करता था । भगवान विष्णु की भक्ति में उसका हार्दिक अनुराग था । वह सदा शान्त रहता था । उसके पाँच पुत्र थे : सुमना, धुतिमान, मेघावी, सुकृत तथा धृष्टबुद्धि ।

धृष्टबुद्धि पाँचवाँ था । वह सदा बड़े-बड़े पापों में ही संलग्न रहता था । जुए आदि दुर्व्यसनों में उसकी बड़ी आसक्ति थी । वह वेश्याओं से मिलने के लिए लालायित रहता था । उसकी बुद्धि न तो देवताओं के पूजन में लगती थी और न पितरों तथा ब्राह्मणों के सत्कार में । वह दुष्टात्मा अन्याय के मार्ग पर चलकर पिता का धन बरबाद किया करता था।

एक दिन वह वेश्या के गले में बाँह डाले चौराहे पर घूमता देखा गया ।

तब पिता ने उसे घर से निकाल दिया तथा बन्धु बान्धवों ने भी उसका परित्याग कर दिया । अब वह दिन रात दु:ख और शोक में डूबा तथा कष्ट पर कष्ट उठाता हुआ इधर उधर भटकने लगा ।

एक दिन किसी पुण्य के उदय होने से वह महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम पर जा पहुँचा । वैशाख का महीना था । तपोधन कौण्डिन्य गंगाजी में स्नान करके आये थे ।

धृष्टबुद्धि शोक के भार से पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिन्य के पास गया और हाथ जोड़ सामने खड़ा होकर बोला : ‘ब्रह्मन् ! द्विजश्रेष्ठ ! मुझ पर दया करके कोई ऐसा व्रत बताइये, जिसके पुण्य के प्रभाव से मेरी मुक्ति हो ।’

कौण्डिन्य बोले: वैशाख के शुक्लपक्ष में ‘मोहिनी’ नाम से प्रसिद्ध एकादशी का व्रत करो । ‘मोहिनी’ को उपवास करने पर प्राणियों के अनेक जन्मों के किये हुए मेरु पर्वत जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं |’

वशिष्ठजी कहते है: श्रीरामचन्द्रजी ! मुनि का यह वचन सुनकर धृष्टबुद्धि का चित्त प्रसन्न हो गया । उसने कौण्डिन्य के उपदेश से विधिपूर्वक ‘मोहिनी एकादशी’ का व्रत किया ।

नृपश्रेष्ठ ! इस व्रत के करने से वह निष्पाप हो गया और दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर आरुढ़ हो सब प्रकार के उपद्रवों से रहित श्रीविष्णुधाम को चला गया ।

इस प्रकार यह ‘मोहिनी’ का व्रत बहुत उत्तम है । इसके पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है ।’

।। बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय ।।

।। श्री एकादशी माता की जय ।।

 

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हर अमावस्या पर करें पितरों की सद्गति और प्रसन्नता के लिए यह उपाय – Bhagwat Gita 7th Adhyay : PART 2

Gita ka seventh Adhyay

ओम नमः शिवाय सज्जनों आज के इस एपिसोड में हम जानेंगे कि पितर हमारे घर के कुलदेवता होते हैं और उनकी प्रसन्नता, शांति, तृप्ति व सद्गति के लिए प्रत्येक अमावस्या पर श्री गीता जी (Bhagwat Gita ji ) के सातवें अध्याय का पाठ करके उसका संपूर्ण पुण्य फल अपने पितरों को अर्पण करने से पितरों की सद्गति भी होती है और साथ ही पितरदेव अपने घर परिवार के व्यक्तियों की बाहरी शक्तियों से रक्षा भी करते हैं। काम – धंधे में बरकत, विजय, सौभाग्य, संतान आदि में वृद्धि भी देते हैं। आइए जानते हैं। श्री गीता जी (Bhagwat Gita ji ) के सातवें अध्याय के बारे में –

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प्रत्येक अमावस्या पर करें पितरों की सद्गति, प्रसन्नता के लिए – Bhagwat Gita 7th Adhyay Mahatmya : PART 1

Gita ka seventh Adhyay

ओम नमः शिवाय सज्जनों आज के इस एपिसोड में हम जानेंगे कि पितर हमारे घर के कुलदेवता होते हैं और उनकी प्रसन्नता, शांति, तृप्ति व सद्गति के लिए प्रत्येक अमावस्या पर श्री गीता जी (Bhagwat Gita ji ) के सातवें अध्याय के माहात्म्य का पाठ करके उसका संपूर्ण पुण्य फल अपने पितरों को अर्पण करने से पितरों की सद्गति भी होती है और साथ ही पितरदेव अपने घर परिवार के व्यक्तियों की बाहरी शक्तियों से रक्षा भी करते हैं। काम – धंधे में बरकत, विजय, सौभाग्य, संतान आदि में वृद्धि भी देते हैं। आइए जानते हैं। श्री गीता जी (Bhagwat Gita Ji) के सातवें अध्याय के माहात्म्य के बारे में –

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Chaitra Kamada Ekadashi Vrat Katha Hindi| चैत्र शुक्ल कामदा एकादशी व्रत कथा

Kamada ekadashi vrat katha vidhi

Kamada ekadashi vrat katha vidhi

 

।। माघ शुक्ला एकादशी व्रत कथा ।।
कामदा एकादशी

 

Chaitra Kamada Ekadashi Vrat Katha

 
कामदा एकदाशी की कथा सुनने के लिए
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युधिष्ठिर ने पूछा: वासुदेव ! आपको नमस्कार है ! कृपया आप यह बताइये कि चैत्र शुक्लपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है?

भगवान श्रीकृष्ण बोले: राजन् ! एकाग्रचित्त होकर यह पुरातन कथा सुनो, जिसे वशिष्ठजी ने राजा दिलीप के पूछने पर कहा था ।

वशिष्ठजी बोले: राजन् ! चैत्र शुक्लपक्ष में ‘कामदा’ नाम की एकादशी होती है । वह परम पुण्यमयी है । पापरुपी ईँधन के लिए तो वह दावानल ही है ।

प्राचीन काल की बात है: नागपुर नाम का एक सुन्दर नगर था, जहाँ सोने के महल बने हुए थे । उस नगर में पुण्डरीक आदि महा भयंकर नाग निवास करते थे । पुण्डरीक नाम का नाग उन दिनों वहाँ राज्य करता था । गन्धर्व, किन्नर और अप्सराएँ भी उस नगरी का सेवन करती थीं । वहाँ एक श्रेष्ठ अप्सरा थी, जिसका नाम ललिता था । उसके साथ ललित नामवाला गन्धर्व भी था । वे दोनों पति पत्नी के रुप में रहते थे । दोनों ही परस्पर काम से पीड़ित रहा करते थे । ललिता के हृदय में सदा पति की ही मूर्ति बसी रहती थी और ललित के हृदय में सुन्दरी ललिता का नित्य निवास था ।

एक दिन की बात है । नागराज पुण्डरीक राजसभा में बैठकर मनोरंजन कर रहा था । उस समय ललित का गान हो रहा था किन्तु उसके साथ उसकी प्यारी ललिता नहीं थी । गाते-गाते उसे ललिता का स्मरण हो आया । अत: उसके पैरों की गति रुक गयी और जीभ लड़खड़ाने लगी ।

नागों में श्रेष्ठ कर्कोटक को ललित के मन का सन्ताप ज्ञात हो गया, अत: उसने राजा पुण्डरीक को उसके पैरों की गति रुकने और गान में त्रुटि होने की बात बता दी । कर्कोटक की बात सुनकर नागराज पुण्डरीक की आँखे क्रोध से लाल हो गयीं ।

उसने गाते हुए कामातुर ललित को शाप दिया : ‘दुर्बुद्धे ! तू मेरे सामने गान करते समय भी पत्नी के वशीभूत हो गया, इसलिए राक्षस हो जा ।’

महाराज पुण्डरीक के इतना कहते ही वह गन्धर्व राक्षस हो गया । भयंकर मुख, विकराल आँखें और देखनेमात्र से भय उपजानेवाला रुप – ऐसा राक्षस होकर वह कर्म का फल भोगने लगा ।

ललिता अपने पति की विकराल आकृति देख मन ही मन बहुत चिन्तित हुई । भारी दु:ख से वह कष्ट पाने लगी । सोचने लगी: ‘क्या करुँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पति पाप से कष्ट पा रहे हैं…’

वह रोती हुई घने जंगलों में पति के पीछे-पीछे घूमने लगी । वन में उसे एक सुन्दर आश्रम दिखायी दिया, जहाँ एक मुनि शान्त बैठे हुए थे । किसी भी प्राणी के साथ उनका वैर विरोध नहीं था । ललिता शीघ्रता के साथ वहाँ गयी और मुनि को प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हुई । मुनि बड़े दयालु थे । उस दु:खिनी को देखकर वे इस प्रकार बोले : ‘शुभे ! तुम कौन हो ? कहाँ से यहाँ आयी हो? मेरे सामने सच-सच बताओ ।’

ललिता ने कहा: महामुने ! वीरधन्वा नामवाले एक गन्धर्व हैं । मैं उन्हीं महात्मा की पुत्री हूँ । मेरा नाम ललिता है । मेरे स्वामी अपने पाप दोष के कारण राक्षस हो गये हैं । उनकी यह अवस्था देखकर मुझे चैन नहीं है । ब्रह्मन् ! इस समय मेरा जो कर्त्तव्य हो, वह बताइये । विप्रवर! जिस पुण्य के द्वारा मेरे पति राक्षसभाव से छुटकारा पा जायें, उसका उपदेश कीजिये ।

ॠषि बोले: भद्रे ! इस समय चैत्र मास के शुक्लपक्ष की ‘कामदा’ नामक एकादशी तिथि है, जो सब पापों को हरनेवाली और उत्तम है । तुम उसीका विधिपूर्वक व्रत करो और इस व्रत का जो पुण्य हो, उसे अपने स्वामी को दे डालो । पुण्य देने पर क्षणभर में ही उसके शाप का दोष दूर हो जायेगा ।

राजन् ! मुनि का यह वचन सुनकर ललिता को बड़ा हर्ष हुआ । उसने एकादशी को उपवास करके द्वादशी के दिन उन ब्रह्मर्षि के समीप ही भगवान वासुदेव के (श्रीविग्रह के) समक्ष अपने पति के उद्धार के लिए यह वचन कहा: ‘मैंने जो यह ‘कामदा एकादशी’ का उपवास व्रत किया है, उसके पुण्य के प्रभाव से मेरे पति का राक्षसभाव दूर हो जाय ।’

वशिष्ठजी कहते हैं: ललिता के इतना कहते ही उसी क्षण ललित का पाप दूर हो गया । उसने दिव्य देह धारण कर लिया । राक्षसभाव चला गया और पुन: गन्धर्वत्व की प्राप्ति हुई ।

नृपश्रेष्ठ ! वे दोनों पति पत्नी ‘कामदा’ के प्रभाव से पहले की अपेक्षा भी अधिक सुन्दर रुप धारण करके विमान पर आरुढ़ होकर अत्यन्त शोभा पाने लगे । यह जानकर इस एकादशी के व्रत का यत्नपूर्वक पालन करना चाहिए ।

मैंने लोगों के हित के लिए तुम्हारे सामने इस व्रत का वर्णन किया है । ‘कामदा एकादशी’ ब्रह्महत्या आदि पापों तथा पिशाचत्व आदि दोषों का नाश करनेवाली है । राजन् ! इसके पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।

।। बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय ।।

।। श्री एकादशी मैया की जय ।।

 

 

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Chaitra Papmochani Ekadashi Vrat Katha | चैत्र कृष्णा पापमोचनी एकादशी कथा

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।। चैत्र कृष्णा एकादशी व्रत कथा ।।
पापमोचनी एकादशी

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पापमोचनी एकदाशी की कथा सुनने के लिए
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धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे महाराज ! आपने फाल्गुन शुक्ला एकादशी का माहात्म्य बतलाया। अब कृपा करके यह बतलाइए कि चैत्र कृष्णा एकादशी का क्या नाम है ? इसमें कौन से देवता की पूजा की जाती है और इसकी विधि क्या है ?

कृष्ण भगवान कहने लगे कि हे राजन् ! यही प्रश्न एक समय राजा मांधाता ने लोमश ऋषि से किया था और जो कुछ उन्होंने उत्तर दिया था सो वही तुमसे कहता हूं।

लोमश ऋषि कहने लगे कि हे राजन् ! इस एकादशी का नाम पापमोचनी एकादशी है और इसके करने से अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं। अब मैं इसकी कथा कहता हूं। प्राचीन समय में कुबेर का चैत्ररथ नाम का एक बाग था। उसमें गंधर्व की कन्याएं किन्नरों के साथ विहार करती थी। वहां अनेक प्रकार के पुष्प खिल रहे थे, उसी वन में अनेक ऋषि तपस्या करते थे। स्वयं इंद्र भी चैत्र और वैशाख मास में देवताओं के सहित वहां आकर क्रीड़ा किया करते थे। वही अपने आश्रम में मेधावी नाम के एक ऋषि भी तपस्या में संलग्न थे। वे शिव के भक्त थे।

एक समय मंजुघोषा नाम की अप्सरा ने उनको मोहित करने का विचार किया। वह ऋषि के भय के मारे समीप नहीं गई, वरन् दूर बैठकर वीणा पर मधुर गीत गाने लगी। उस समय कामदेव ने भी मेधावी ऋषि को जीतने की चेष्टा की। उन्होंने उस सुंदर अप्सरा के भ्रू को धनुष, कटाक्ष को डोरी, नेत्रों को धनुष की लचक, कूचों को कुरी बनाकर मंजुघोषा को सेनापति बनाया। उस समय मेधावी ऋषि भी युवा और हष्ट पुष्ट थे। साथ ही यज्ञोपवीत तथा दंड धारण किए हुए ब्रह्म तेज से युक्त थे।

मंजुघोषा ऐसे सुंदर ऋषि को देखकर उनकी सुंदरता पर मुग्ध हो गई और अपने गीत, चूड़ियों और नूपुरों की झंकार तथा नृत्य कला द्वारा हाव-भाव दिखाकर मुनि को रिझाने लगी। पर्याप्त समय तक यह क्रम चलता रहा और अंत में कामदेव ने ऋषि को पराजित कर दिया।

फलस्वरूप ऋषि मंजुघोषा के साथ रमण करने लगे और काम के इतने वशीभूत हो गए कि उन्हें दिन तथा रात्रि का कुछ भी विचार नहीं रहा।

इस प्रकार बहुत समय बीत गया, तब एक दिन मंजुघोषा कहने लगी ऋषि जी बहुत दिन हो गए अब मुझको स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए।

मुनि ने कहा आज इसी संध्या को तो आई हो प्रातः काल होने तक चली जाना। मुनि के ऐसे वचन सुनकर अप्सरा कुछ समय तक और रुकी।

अंत में उसने पुनः मुनि से विदा मांगी तो मुनि कहने लगे कि अभी तो आधी रात ही हुई है।

अप्सरा ने कहा महाराज आपकी रात तो बहुत लंबी है। इसका क्या परिमाण है ? मुझको यहां पर आए कितने ही वर्ष बीत गए हैं।

उस अप्सरा की यह बात सुनकर मुनि को समय का ज्ञान हुआ तो विचार करने लगे कि इस अप्सरा के साथ रमण करते हुए हमको सत्तावन वर्ष, सात माह और तीन दिन बीत गए, तो वह उनको काल के समान प्रतीत हुई।

मुनि अत्यंत क्रोधित हुए और उनकी आंखों से ज्वाला उत्पन्न होने लगी। वे कहने लगे कि मेरी कठिन परिश्रम से एकत्रित की हुई तपस्या को तूने नष्ट करा दिया है। तुम महा पापिनी और दुराचारिणी है, तुझे धिक्कार है। तूने मेरे साथ घात किया है इसलिए तू मेरे श्राप से पिशाचिनी हो जा।

मुनि के श्राप से मंजुघोषा तत्क्षण पिशाचिनी हो गई और भयभीत होकर मुनि से प्रार्थना करने लगी कि महाराज इस श्राप का किसी प्रकार से निवारण कीजिए। अप्सरा के ऐसे दीन वचन सुनकर मुनि बोले कि दुष्टे यद्यपि तूने मेरा बहुत अनिष्ट किया है परंतु फिर भी

मैं तुझे श्राप से छूटने का उपाय बतलाता हूं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम आप पापमोचनी है और यह सब प्रकार के पापों का नाश करने वाली है। उसका व्रत करने से पिशाच योनि से मुक्त हो जाएगी।

ऐसा कहकर मेधावी ऋषि अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम में चले गए।

मेधावी को देखकर च्यवन ऋषि कहने लगे कि अरे पुत्र ! तूने ऐसा क्या किया जिससे तेरा सारा पुण्य क्षीण हो गया ?

मेधावी कहने लगे कि पिताजी मैंने अप्सरा के साथ रमण करके घोर पाप किया है। अब आप इस पाप से छूटने का प्रायश्चित मुझे बतलाइए।

तब च्यवन ऋषि कहने लगे कि हे पुत्र ! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत करने से सब पापों का नाश हो जाता है, इसलिए तुम इस व्रत को करो। पिता की आज्ञा पाकर मेधावी ऋषि ने भी इस व्रत को किया जिससे उनके सब पाप नष्ट हो गए और वे पवित्र हो गये।

उधर मंजुघोषा भी व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि से छूटकर दिव्य देह धारण करके स्वर्ग को चली गई। लोमश ऋषि कहने लगे कि हे राजन् पापमोचनी एकादशी के व्रत को करने से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। इस कथा को पढ़ने और सुनने से हजार गोदान का फल प्राप्त होता है और व्रत से ब्रह्महत्या, गर्भपात, बालहत्या, सुरापान, गुरु स्त्री से प्रसंग आदि सब पाप नष्ट हो जाते हैं।

।। बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय ।।

।। श्री एकादशी माता की जय ।।

 
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Phalgun Amalaki Ekadashi Vrat Katha | फाल्गुन शुक्ला आमलकी एकादशी कथा

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।। फाल्गुन शुक्ला एकादशी व्रत कथा ।।
आमलकी एकादशी

 

Phalgun Amalaki Ekadashi Vrat Katha

 

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मांधाता बोले कि हे वशिष्ठ जी ! यदि आप मुझ पर कृपा करें तो किसी ऐसे व्रत की कथा कहिए जिससे मेरा कल्याण हो।

महर्षि वशिष्ट बोले कि हे राजन् सब व्रतों से उत्तम और अंत में मोक्ष देने वाले आमलकी एकादशी के व्रत का मैं वर्णन करता हूं। यह एकादशी फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष में होती है। इस व्रत के करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत का फल एक हजार गोदान के फल के बराबर होता है। अब मैं आपसे एक पौराणिक कथा कहता हूं, आप ध्यान पूर्वक सुनिए।

एक वैदिश नाम का नगर था। जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण आनंद सहित रहते थे। उस नगर में सदैव वेद ध्वनि गुंजा करती थी तथा पापी, दुराचारी तथा नास्तिक उस नगर में कोई नहीं था। उस नगर में चैतरथ नाम का चन्द्रवंशी राजा राज्य करता था। वह अत्यंत विद्वान तथा धर्मी था। उस नगर में कोई भी व्यक्ति दरिद्र व कंजूस नहीं था। सभी नगरवासी विष्णु भक्त थे और आबाल-वृद्ध, स्त्री, पुरुष एकादशी का व्रत किया करते थे।

एक समय फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। उस दिन राजा प्रजा तथा बाल – वृद्ध सबने हर्ष पूर्वक व्रत किया।

राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में जाकर पूर्ण कुंभ स्थापित करके धूप – दीप, नैवेद्य, पंचरत्न आदि से धात्री आंवले का पूजन करने लगे और इस प्रकार स्तुति करने लगे कि हे धात्री ! तुम ब्रह्म स्वरूप हो, तुम ब्रह्मा जी द्वारा उत्पन्न हो और समस्त पापों का नाश करने वाले हो, तुम को नमस्कार है। अब तुम मेरा अर्घ्य स्वीकार करो। तुम श्री रामचंद्र जी द्वारा सम्मानित हो मैं आपकी प्रार्थना करता हूं। अतः आप मेरे समस्त पापों का नाश करो। उस मंदिर में सबने रात्रि को जागरण किया।

रात के समय वहां एक बहेलिया आया जो अत्यंत पापी तथा दुराचारी था। वह अपने कुटुंब का पालन जीव हिंसा करके किया करता था। भूख तथा प्यास से अत्यंत व्याकुल वह बहेलिया इस जागरण को देखने के लिए मंदिर के एक कोने में बैठ गया और विष्णु भगवान् तथा एकादशी माहात्म्य की कथा सुनने लगा। इस प्रकार से अन्य मनुष्यों की भांति उसने भी सारी रात जागकर बिता दी। प्रातः काल होते ही सब लोग अपने – अपने घर चले गए तो बहेलिया भी अपने घर चला गया। घर जाकर उसने भोजन किया। कुछ समय बीतने के पश्चात बहेलिये की मृत्यु हो गई। मगर उस आमलकी एकादशी के व्रत तथा जागरण से उसने राजा विदूरथ के घर जन्म लिया और उसका नाम व वसुरथ रखा गया। युवा होने पर वह चतुरंगिणी सेना के सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर दस हजार ग्रामों का पालन करने लगा। वह तेज में सूर्य के समान, कांति में चंद्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर एवं विष्णु भक्त था। वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था। दान देना उसका मुख्य कर्तव्य था।

एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए गया। दैवयोग से वह मार्ग भूल गया और दिशा ज्ञान न रहने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के नीचे सो गया। थोड़ी देर बाद पहाड़ी मलेच्छ वहां पर आ गए और राजा को अकेला देखकर मारो – मारो शब्द करते हुए राजा की ओर दौड़े। मलेच्छ कहने लगे कि इसी दुष्ट राजा ने हमारे माता – पिता, पुत्र आदि अनेक संबंधियों को मारा है तथा देश से निकाल दिया है। अतः इसको अवश्य मारना चाहिए। ऐसा कहकर वे मलेच्छ उस राजा को मारने दौड़े और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र उसके ऊपर फेंके। वे सब अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर पर गिरते ही नष्ट हो जाते और उनका वार पुष्प के समान प्रतीत होता। अब उन मनुष्यों के अस्त्र-शस्त्र उल्टा उन्हीं पर प्रहार करने लगे जिससे वे मूर्छित होकर गिरने लगे। उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य स्त्री उत्पन्न हुई। वह स्त्री अत्यंत सुंदर होते हुए भी उसकी भृकुटी टेढ़ी थी। उसकी आंखों से लाल-लाल अग्नि निकल रही थी। जिससे वह दूसरे काल के समान प्रतीत होती थी। वह स्त्री मलेच्छों को मारने दौड़ी और थोड़ी ही देर में उसने सब मनुष्यों को काल के गाल में पहुंचा दिया। जब राजा सोकर उठा तो उसने मलेच्छों को मरा हुआ देखकर कहा कि इन शत्रुओं को किसने मारा है ? इस वन में मेरा कौन हितैषी रहता है ?

ऐसा विचार कर ही रहा था कि आकाशवाणी हुई – हे राजा इस संसार में विष्णु भगवान के अतिरिक्त कौन तेरी सहायता कर सकता है। इस आकाशवाणी को सुनकर राजा अपने राज्य में आ गया और सुख पूर्वक राज्य करने लगा। महर्षि वशिष्ठ बोले कि हे राजन् ! यह आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था। जो मनुष्य इस आमलकी एकादशी का व्रत करते हैं, वह प्रत्येक कार्य में सफल होते हैं और अंत में विष्णु लोक को जाते हैं।


।। बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय ।।

।। श्री एकादशी मैया की जय ।।

 

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Phalgun Vijaya Ekadashi Vrat Katha | फाल्गुन कृष्णा विजया एकादशी व्रत कथा

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।। फाल्गुन कृष्णा एकादशी व्रत कथा ।।
विजया एकादशी

 

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विजया एकदाशी की कथा सुनने के लिए
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धर्मराज युधिष्ठिर बोले कि हे जनार्दन ! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है तथा उसकी विधि क्या है ? सो सब कृपा पूर्वक कहिए।

श्रीभगवान् बोले कि हे राजन् ! फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम विजया एकादशी है। इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्य को विजय प्राप्त होती है। यह सब व्रतों से उत्तम व्रत है। इस विजया एकादशी के माहात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं।

एक समय देव ऋषि नारद जी ने जगतपिता ब्रह्मा जी से कहा कि महाराज आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी का विधान कहिए।

ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे नारद ! विजया एकादशी का व्रत पुराने तथा नए पापों को नाश करने वाला है। इस विजया एकादशी की विधि मैंने आज तक किसी से भी नहीं कहीं। यह समस्त मनुष्यों को विजय प्रदान करती है। त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र जी को जब 14 वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण जी तथा श्री सीता जी के सहित पंचवटी में निवास करने लगे। वहां पर दुष्ट रावण ने जब सीता जी का हरण किया तब इस समाचार से श्री रामचंद्र जी तथा लक्ष्मण अत्यंत व्याकुल हुए और श्री सीता जी की खोज में चल दिए। घूमते – घूमते जब वह मरणासन्न जटायु के पास पहुंचे तो जटायु उन्हें सीता जी का वृत्तांत सुनाकर स्वर्ग लोक चला गया। कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और बाली का वध किया। हनुमान जी ने लंका में जाकर सीता जी का पता लगाया और उनसे श्री रामचंद्र जी एवं सुग्रीव की मित्रता का वर्णन किया। वहां से लौटकर हनुमान जी श्री रामचंद्र जी के पास आए और सब समाचार कहे। श्री रामचंद्र जी ने वानर सेना सहित सुग्रीव की सम्मति से लंका को प्रस्थान किया।

जब श्री रामचंद्र जी समुद्र के किनारे पहुंचे तब उन्होंने मगरमच्छ आदि से युक्त उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मण जी से कहा कि इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार कर सकेंगे।

श्री लक्ष्मण जी कहने लगे कि हे पुराण पुरुषोत्तम, आप आदि पुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। यहां से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदालभ्य नाम के मुनि रहते हैं, उन्होंने अनेकों ब्रह्मा देखे हैं, आप उनके पास जाकर इसका उपाय पूछिये।

लक्ष्मण जी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामचंद्र जी वकदालभ्य ऋषि के पास गए और उनको प्रणाम करके बैठ गए।

मुनि ने भी उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा कि हे राम ! आपका आना कैसे हुआ ?

रामचंद्र जी कहने लगे कि हे ऋषि मैं अपनी सेना सहित यहां आया हूं और राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूं। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बतलाइए, मैं इसी कारण आपके पास आया हूं।

वकदालभ्य ऋषि बोले कि हे राम ! फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे।

इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबा या मिट्टी का एक घड़ा बनावे। उस घड़े को जल से भरकर तथा पंच पल्लव रख वेदिका पर स्थापित करें। उस घड़े के नीचे सतनाजा और ऊपर जौं रखें। उस पर श्रीनारायण भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें। एकादशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप – दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान का पूजन करें। तत्पश्चात दिन घड़े के सामने बैठकर व्यतीत करें और रात्रि को भी उसी प्रकार बैठे रहकर जागरण करें। द्वादशी के दिन नित्य नियम से निवृत्त होकर उस घड़े को ब्राह्मण को दे देवें।

हे राम ! यदि तुम भी इस व्रत को सेनापतियों सहित करोगे तो तुम्हारी विजय अवश्य होगी।

श्री रामचंद्र जी ने ऋषि के कथन अनुसार इस व्रत को किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई। अतः हे राजन ! जो कोई मनुष्य विधि पूर्वक इस व्रत को करेगा। दोनों लोकों में उसकी अवश्य विजय होगी।

श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था कि हे पुत्र ! जो कोई इस व्रत के महत्व को पढ़ता या सुनता है उसको वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

।। बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय ।।

।। श्री एकादशी मैया की जय ।।

 

 

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Magh Jaya Ekadashi Vrat KathaVidhi hindi | माघ शुक्ला जया एकादशी व्रत कथा

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।। माघ शुक्ला एकादशी व्रत कथा ।।
जया एकादशी

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जया एकदाशी की कथा सुनने के लिए
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धर्मराज युधिष्ठिर बोले हे भगवन ! आपने माघ के कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है। आप स्वेदज, अंडज, उद्भिज और जरायुज चारों प्रकार के जीवों के उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले हैं। अब आप कृपा करके माघ शुक्ला एकादशी का वर्णन कीजिए। इसका क्या नाम है इसके व्रत की क्या विधि है और इसमें कौन से देवता का पूजन किया जाता है ?

श्री कृष्ण कहने लगे कि हे राजन ! इस एकादशी का नाम जया एकादशी है। इसका व्रत करने से मनुष्य ब्रहमहत्यादि पापों से छूट कर मोक्ष को प्राप्त होता है तथा इसके प्रभाव से भूत, पिशाच आदि योनियों से मुक्त हो जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करना चाहिए। अब मैं तुमसे पदम पुराण में वर्णित इसकी महिमा की एक कथा कहता हूं।

देवराज इंद्र स्वर्ग में राज करते थे और अन्य सब देवगण सुखपूर्वक स्वर्ग में रहते थे। एक समय इंद्र अपनी इच्छा अनुसार नंदनवन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे और गंधर्व गान कर रहे थे। उन गंधर्वों में प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उसकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी स्त्री मालिनी भी थे। मालिनी का पुत्र पुष्पवान और उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे। पुष्पवती गंधर्व कन्या माल्यवान को देखकर उस पर मोहित हो गई और माल्यवान पर काम – बाण चलाने लगी। उसने अपने रूप, लावण्य और हाव-भाव से माल्यवान को अपने वश में कर लिया। हे राजन ! वह पुष्पवती अत्यंत सुंदर थी। अब वह इंद्र को प्रसन्न करने के लिए गान करने लगे परंतु परस्पर मोहित हो जाने के कारण उनका चित्त भ्रमित हो गया था। इनके ठीक प्रकार न गाने तथा ताल स्वर ठीक न होने से इंद्र इनके प्रेम को समझ गया और उसने इसमें अपना अपमान समझकर उनको शाप दे दिया।

उसने कहा कि मूर्खों तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है इसलिए तुम्हें धिक्कार है। अब तुम दोनों स्त्री पुरुष के रूप में मृत्युलोक में जाकर पिशाच रूप धारण करो और अपने कर्म का फल भोगो।

इंद्र का ऐसा शाप सुनकर वह अत्यंत दुखी हुए और हिमालय पर्वत पर दुःखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने लगे। उन्हें गंध, रस तथा स्पर्श आदि का कुछ भी ज्ञान नहीं था। वहां उनको महान दुःख मिल रहे थे। उन्हें एक क्षण के लिए भी निद्रा नहीं आती थी। उस जगह अत्यंत शीत था इससे उनके रोमांच खड़े रहते और दांत मारे शीत के बजते रहते।

एक दिन उसने अपनी स्त्री से कहा कि पिछले जन्म में हमने ऐसे कौन से पाप किए थे, जिससे हमको यह दुःखदाई पिशाच योनि प्राप्त हुई। इस पिशाच योनि से तो नर्क के दुख सहना ही उत्तम है। अतः हमें अब किसी प्रकार का पाप नहीं करना चाहिए।

इस प्रकार विचार करते हुए वह अपने दिन व्यतीत कर रहे थे। दैवयोग से तभी माघ मास में शुक्ल पक्ष की जया नामक एकादशी आई। उस दिन उन्होंने कुछ भी भोजन नहीं किया और ना कोई पाप कर्म ही किया। केवल फल – फूल खाकर ही दिन व्यतीत किया और सायं समय महान दुःख से पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। उस समय सूर्य भगवान अस्त हो रहे थे। उस रात को अत्यंत ठंड थी। इस कारण वे दोनों शीत के मारे अति दुखित होकर मृतक के समान आपस में चिपके हुए पड़े रहे। उस रात्रि उनको निद्रा भी नहीं आई।

हे राजन ! जया एकादशी के उपवास और रात्रि के जागरण से दूसरे दिन प्रभात होते ही उनकी पिशाच योनि छूट गई। अत्यंत सुंदर गंधर्व और अप्सरा की देह धारण कर सुंदर वस्त्र आभूषणों से अलंकृत होकर उन्होंने स्वर्ग लोक को प्रस्थान किया। उस समय आकाश में देवता तथा गंधर्व उनकी स्तुति करते हुए पुष्प वर्षा करने लगे। स्वर्ग लोक में जाकर इन दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया।

इंद्र इनको पहले रूप में देखकर अत्यंत आश्चर्यचकित हुआ और पूछने लगा कि तुमने अपनी पिशाच योनि से किस प्रकार छुटकारा पाया, सो सब बतलाओ।

माल्यवान बोले की हे देवेंद्र ! भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत के प्रभाव से ही हमारी पिशाच योनि छूट गई है!

तब इंद्र बोले कि हे माल्यवान ! भगवान की कृपा और एकादशी के व्रत करने से न केवल तुम्हारी पिशाच योनि छूट गई वरन् हम लोगों के भी वंदनीय हो गए क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हम लोगों के वंदनीय हैं! अतः आप धन्य हैं! अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो।

श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे राजा युधिष्ठिर ! इस जया एकादशी के व्रत से बुरी योनि छूट जाती है। जिस मनुष्य ने इस एकादशी का व्रत किया है उसने मानों सब यज्ञ, जप, दान आदि कर लिए। जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करते हैं वे अवश्य ही हजार वर्ष तक स्वर्ग में वास करते हैं।

।। बोलिए श्री विष्णु भगवान की जय ।।

।। श्री एकादशी मैया की जय ।।

 

 

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